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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1316
ऋषिः - वसुर्भारद्वाजः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम -
5
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡मो꣢ अरु꣣षो꣢꣫ वृषा꣣ ह꣢री꣣ रा꣡जे꣢व द꣣स्मो꣢ अ꣣भि꣡ गा अ꣢꣯चिक्रदत् । पु꣢नानो꣢꣫ वार꣣म꣡त्ये꣢ष्य꣣व्य꣡य꣢ꣳ श्ये꣣नो꣡ न योनिं꣢꣯ घृ꣣त꣡व꣢न्त꣣मा꣡स꣢दत् ॥१३१६॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡सा꣢꣯वि । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣रुषः꣡ । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । रा꣡जा꣢꣯ । इ꣣व । दस्मः꣢ । अ꣣भि꣢ । गाः । अ꣣चिक्रदत् । पुनानः꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡ति꣢꣯ । ए꣣षि । अव्य꣡य꣢म् । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । घृ꣣त꣡व꣢न्तम् । आ । अ꣣सदत् ॥१३१६॥
स्वर रहित मन्त्र
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत् । पुनानो वारमत्येष्यव्ययꣳ श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत् ॥१३१६॥
स्वर रहित पद पाठ
असावि । सोमः । अरुषः । वृषा । हरिः । राजा । इव । दस्मः । अभि । गाः । अचिक्रदत् । पुनानः । वारम् । अति । एषि । अव्ययम् । श्येनः । न । योनिम् । घृतवन्तम् । आ । असदत् ॥१३१६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1316
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ सोम ओषधि का विषय और जीवात्मा का विषय वर्णित किया जा रहा है।
पदार्थ -
प्रथम—सोमौषधि के पक्ष में। (अरुषः) चमकीले, (वृषा) रसवर्षक, (हरिः) हरे रंग के (सोमः) ओषधिराज सोम में से (असावि) मैंने रस निकाला है। (दस्मः) दर्शनीय यह, मानो (गाः अभि) गाय के दूध में मिलने के लिए (अचिक्रदत्) बोल रहा है, (राजा इव) जैसे कोई राजा (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक होता हुआ (गाः अभि) शत्रुओं की भूमियों पर आक्रमण करके (अचिक्रदत्) जयघोष करता है। हे ओषधिराज सोम ! (पुनानः) शुद्ध किये जाते हुए तुम (अव्ययं वारम् अत्येषि) भेड़ के बालों से बनी हुई दशापवित्र नामक छन्नी में से छनकर पार होते हो। देखो, यह ओषधिराज सोम (घृतवन्तम्) घृतयुक्त (योनिम्) यज्ञगृह में (आसदत्) आया है, (श्येनः न) जैसे वायु (घृतवन्तम्) जल-कणों से युक्त (योनिम्) अन्तरिक्ष में (आसदत्) आता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (सोम) प्रेरक जीवात्मा (असावि) ऐश्वर्यवान् किया गया है। (अरुषः) ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान, (वृषा) ज्ञानवर्षक, (हरिः) देहरूप रथ को चलानेवाला, (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक यह आत्मा (गाः अभि) इन्द्रियों को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश करे, (राजा इव) जैसे कोई राजा (गाः अभि) प्रजाओं को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) राजनियमों की घोषणा करता है। हे जीवात्मन् ! तू (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वारम् अति) रुकावट डालनेवाले विघ्नों को पार करके (अव्ययम्) अविनश्वर परमात्मा को (एषि) प्राप्त कर। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे उड़ान भरने के लिए अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है, वैसे ही यह आत्मा (घृतवन्तम्) तेजस्वी (योनिम्) जगत् के कारण परमात्मा को (आसदत्) प्राप्त करे ॥१॥ यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं। प्रथम व्याख्या में ‘अभि गा अचिक्रदत्’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥
भावार्थ - जैसे पक्षी उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँच जाते हैं, वैसे ही मनुष्य उन्नति करके परमात्मा को प्राप्त करें ॥१॥
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