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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 135
ऋषिः - कण्वो घौरः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥

स्वर सहित पद पाठ

इ꣣ह꣢ । इ꣣व । शृण्वे । एषाम् । क꣡शाः꣢꣯ । ह꣡स्ते꣢꣯षु । यत् । व꣡दा꣢꣯न् । नि । या꣡म꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ऋ꣣ञ्जते ॥१३५॥


स्वर रहित मन्त्र

इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामं चित्रमृञ्जते ॥१३५॥


स्वर रहित पद पाठ

इह । इव । शृण्वे । एषाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । वदान् । नि । यामन् । चित्रम् । ऋञ्जते ॥१३५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 135
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 3;
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पदार्थ -
प्रथम—सैनिकों के पक्ष में। (एषाम्) इन सैनिकों के (हस्तेषु) हाथों में, युद्धकाल में (यत्) जो (कशाः) चाबुकें (वदान्) बोलती हैं, वह इनका शब्द (इह इव) मानो यहीं, युद्ध से भिन्न स्थल में भी (शृण्वे) मैं सुन रहा हूँ। यह सैनिकों का गण (यामन्) संग्राम में (चित्रम्) अद्भुत (निऋञ्जते) प्रसाधन करता है ॥ वेद में सैनिकों का वेशप्रसाधन इस रूप में वर्णित हुआ है—तुम्हारे कंधों पर ऋष्टियाँ हैं, पैरों में पादत्राण हैं, वक्षःस्थलों पर सोने के तमगे हैं, तुम रथ पर शोभायमान हो। तुम्हारी बाहुओं में अग्नि के समान चमकनेवाले विद्युदस्त्र हैं, सिरों पर सुनहरी पगड़ियाँ हैं। ऋ० ५।५४।११, तुम उत्कृष्ट हथियारों से युक्त हो, गतिमान् हो, उत्कृष्ट स्वर्णालङ्कार धारण किये हो। ऋ० ७।५६।११। द्वितीय—प्राणों के पक्ष में। (एषाम्) इन प्राणों के (हस्तेषु) पूरक-कुम्भक क्रियारूप हाथों में (यत्) जो (कशाः) कानों से न सुनायी देनेवाली सूक्ष्म वाणियों (वदान्) ध्वनित होती हैं, उस आवाज को (इह इव) मानो यहीं, प्राणाभ्यास से अतिरिक्त दशा में भी (शृण्वे) सुन रहा हूँ। यह प्राणगण (यामन्) अभ्यास मार्ग में (चित्रम्) अद्भुत रूप से (निऋञ्जते) प्राणायामाभ्यासी योगी को योगैश्वर्यों से अलंकृत कर देता है ॥१॥ इस मन्त्र में भूतकाल की वस्तु को वर्तमान काल में प्रत्यक्ष घटित के समान वर्णन करने के कारण भाविक अलङ्कार है। सैनिक तथा प्राण इन दो अर्थों को अभिहित करने से श्लेष भी है ॥१॥

भावार्थ - जैसे राजा के सहायक सैनिक लोग राष्ट्र की रक्षा करते हैं, वैसे ही योगी के सहायक प्राण योगी के योग की रक्षा करते हैं। युद्धों में शत्रुओं के सम्मुख सैनिकों की चाबुकें आवाज करती हैं, उस दृश्य को जिन्होंने देखा होता है, उससे चमत्कृत होने के कारण युद्ध से भिन्न स्थलों में भी उन्हें ऐसा लगता है कि वे आवाजें सुनायी दे रही हैं। सैनिकों का वीरोचित वेश-विन्यास भी अद्भुत ही प्रतीत होता है। प्राण भी योगियों के सैनिक ही हैं, जो शरीर में उत्पन्न सब दोषों को बाहर निकाल देते हैं, इन्द्रियों को निर्मल करते हैं और योगैश्वर्य की प्राप्ति के प्रयास को सफल बनाते हैं ॥१॥

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