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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1548
ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
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भ꣣द्रो꣢ भ꣣द्र꣢या꣣ स꣡च꣢मा꣣न आ꣢गा꣣त्स्व꣡सा꣢रं जा꣣रो꣢ अ꣣꣬भ्ये꣢꣯ति प꣣श्चा꣢त् । सु꣣प्रकेतै꣡र्द्युभि꣢꣯र꣣ग्नि꣢र्वि꣣ति꣢ष्ठ꣣न्रु꣡श꣢द्भि꣣र्व꣡र्णै꣢र꣣भि꣢ रा꣣म꣡म꣢स्थात् ॥१५४८॥

स्वर सहित पद पाठ

भद्रः꣢ । भ꣣द्र꣡या꣢ । स꣡च꣢꣯मानः । आ । अ꣣गात् । स्व꣡सा꣢꣯रम् । जा꣣रः꣢ । अ꣣भि꣢ । ए꣣ति । पश्चा꣢त् । सु꣣प्रकेतैः꣢ । सु꣣ । प्रकेतैः꣢ । द्यु꣡भिः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । वि꣣ति꣡ष्ठ꣢न् । वि꣣ । ति꣡ष्ठ꣢꣯न् । रु꣡श꣢꣯द्भिः । व꣡र्णैः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । रा꣣म꣢म् । अ꣣स्थात् ॥१५४८॥


स्वर रहित मन्त्र

भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात् । सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन्रुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात् ॥१५४८॥


स्वर रहित पद पाठ

भद्रः । भद्रया । सचमानः । आ । अगात् । स्वसारम् । जारः । अभि । एति । पश्चात् । सुप्रकेतैः । सु । प्रकेतैः । द्युभिः । अग्निः । वितिष्ठन् । वि । तिष्ठन् । रुशद्भिः । वर्णैः । अभि । रामम् । अस्थात् ॥१५४८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1548
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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पदार्थ -
(भद्रः) श्रेष्ठ सूर्य (भद्रया) श्रेष्ठ दीप्ति से (सचमानः) संयुक्त होता हुआ (आगात्) आया है। (जारः) रात्रि को जीर्ण करता हुआ वह (स्वसारम्) भली-भाँति अन्धकार को दूर फेंकनेवाली उषा के (पश्चात्) पीछे (अभ्येति) आता है। (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर (सुप्रकेतैः) सुप्रकाशमान (द्युभिः) तेजों से (वितिष्ठन्) व्याप्त होता हुआ (रुशद्भिः वर्णैः) सूर्य के चमकीले रंगों से (रामम्) काले अँधेरे को (अभि अस्थात्) दूर करता है ॥३॥

भावार्थ - रात्रि के बाद उषा, उषा के बाद दिन, दिन के बाद सन्ध्या, सन्ध्या के बाद फिर रात्रि, रात्रि के बाद फिर उषा, यह जो चक्र चल रहा है, उसका चलानेवाला जगदीश्वर के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है, क्योंकि मनुष्य में ऐसा सामर्थ्य नहीं है ॥३॥

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