Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1860
ऋषिः - अप्रतिरथ ऐन्द्रः
देवता - मरुतः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
6
अ꣣सौ꣡ या सेना꣢꣯ मरुतः꣣ प꣡रे꣢षाम꣣भ्ये꣡ति꣢ न꣣ ओ꣡ज꣢सा꣣ स्प꣡र्ध꣢माना । तां꣡ गू꣢हत꣣ त꣢म꣣सा꣡प꣢व्रतेन꣣ य꣢थै꣣ते꣡षा꣢म꣣न्यो꣢ अ꣣न्यं꣢꣫ न जा꣣ना꣢त् ॥१८६०॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣सौ꣢ । या । से꣡ना꣢꣯ । म꣣रुतः । प꣡रे꣢꣯षाम् । अ꣣भ्ये꣡ति꣢ । अ꣣भि । ए꣡ति꣢꣯ । नः꣣ । ओ꣡ज꣢꣯सा । स्प꣡र्ध꣢꣯माना । ताम् । गू꣣हत । त꣡म꣢꣯सा । अ꣡प꣢꣯व्रतेन । अ꣡प꣢꣯ । व्र꣣तेन । य꣡था꣢꣯ । ए꣣ते꣡षा꣢म् । अ꣣न्यः꣢ । अ꣣न् । यः꣢ । अ꣣न्य꣢म् । अ꣣न् । य꣢म् । न । जा꣣ना꣢त् ॥१८६०॥
स्वर रहित मन्त्र
असौ या सेना मरुतः परेषामभ्येति न ओजसा स्पर्धमाना । तां गूहत तमसापव्रतेन यथैतेषामन्यो अन्यं न जानात् ॥१८६०॥
स्वर रहित पद पाठ
असौ । या । सेना । मरुतः । परेषाम् । अभ्येति । अभि । एति । नः । ओजसा । स्पर्धमाना । ताम् । गूहत । तमसा । अपव्रतेन । अप । व्रतेन । यथा । एतेषाम् । अन्यः । अन् । यः । अन्यम् । अन् । यम् । न । जानात् ॥१८६०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1860
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - अगले मन्त्र में शत्रुओं को मोह में डालने की प्रेरणा दी गयी है।
पदार्थ -
हे (मरुतः) प्राणो वा वीर सैनिको ! (असौ या) यह जो (ओजसा) अपने बल से (स्पर्धमाना) हमसे स्पर्धा करती हुई (परेषाम्) शत्रुओं की (सेना) सेना (नः अभ्येति) हमारी ओर बढ़ी आ रही है, (ताम्) उस सेना को (अपव्रतेन) जिसमें कार्य बन्द हो जाते हैं, ऐसे (तमसा) अन्धकार से (गूहत) आच्छन्न कर दो, (यथा) जिससे (एतेषाम्) इनमें (अन्यः) एक (अन्यम्) दूसरे को (न जानात्) न जान सके ॥३॥
भावार्थ - जैसे युद्ध में सम्मोहनास्त्र के प्रयोग द्वारा घोर अन्धकार के व्याप्त हो जाने पर शत्रु एक-दूसरे को ही नहीं देख पाते, वैसे ही जीवात्मा के प्राणायाम द्वारा प्रयुक्त सम्मोहन से सभी आन्तरिक काम-क्रोध आदि वा अविद्या-अस्मिता आदि शत्रु सर्वथा मोह को प्राप्त हो जाएँ ॥३॥
इस भाष्य को एडिट करें