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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 951
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
14
इ꣡न्द्रा꣢य नू꣣न꣡म꣢र्चतो꣣क्था꣡नि꣢ च ब्रवीतन । सु꣣ता꣡ अ꣢मत्सु꣣रि꣡न्द꣢वो꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ नमस्यता꣣ स꣡हः꣢ ॥९५१॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्द्रा꣢꣯य । नू꣣न꣢म् । अ꣣र्चत । उक्था꣡नि꣢ । च꣣ । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः꣡ । अ꣡मत्सुः । इ꣡न्द꣢꣯वः । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । न꣣मस्यत । स꣡हः꣢꣯ ॥९५१॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन । सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥९५१॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्राय । नूनम् । अर्चत । उक्थानि । च । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः । अमत्सुः । इन्दवः । ज्येष्ठम् । नमस्यत । सहः ॥९५१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 951
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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विषय - अगले मन्त्र में पुनः जीवात्मा के उद्बोधन का विषय है।
पदार्थ -
हे मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय) अपने अन्तरात्मा की (नूनम्) अवश्य (अर्चत) स्तुति करो, (उक्थानि च) और उद्बोधनगीतों को (ब्रवीतन) उच्चारण करो। (सुताः) प्रेरित (इन्दवः) वीररस और भक्तिरस तुम्हारे अन्तरात्मा को (अमत्सुः) हर्षित और उत्साहित करें। इस आत्मा के (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (सहः) बल की, तुम (नमस्यत) प्रशंसा करो ॥३॥
भावार्थ - मनुष्य के अपने अन्तरात्मा में महान् बल निहित है। उसे उद्बोधन देकर और प्रभुभक्ति से माँजकर सब कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं ॥३॥
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