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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 965
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
5
त्व꣡ꣳ सो꣢म नृ꣣मा꣡द꣢नः꣣ प꣡व꣢स्व चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ । स꣢स्नि꣣र्यो꣡ अ꣢नु꣣मा꣡द्यः꣢ ॥९६५॥
स्वर सहित पद पाठत्वम् । सो꣣म । नृमा꣡द꣢नः । नृ꣣ । मा꣡द꣢꣯नः । प꣡व꣢꣯स्व । च꣣र्षणीधृ꣡तिः꣢ । च꣣र्षणि । धृ꣡तिः꣢꣯ । स꣡स्निः꣢꣯ । यः । अ꣣नुमा꣡द्यः꣢ । अ꣣नु । मा꣡द्यः꣢꣯ ॥९६५॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वꣳ सोम नृमादनः पवस्व चर्षणीधृतिः । सस्निर्यो अनुमाद्यः ॥९६५॥
स्वर रहित पद पाठ
त्वम् । सोम । नृमादनः । नृ । मादनः । पवस्व । चर्षणीधृतिः । चर्षणि । धृतिः । सस्निः । यः । अनुमाद्यः । अनु । माद्यः ॥९६५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 965
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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विषय - आगे पुनः परमात्मा के विषय का वर्णन है।
पदार्थ -
हे (सोम) रस के भण्डार, शुभकर्मों में प्रेरक, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक, सर्वान्तर्यामी,परमपिता जगदीश्वर ! (नृमादनः) मनुष्यों को आनन्दित करनेवाले, (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले (त्वम्) आप (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए, (यः) जो आप (सस्निः) सर्वथा शुद्ध और (अनुमाद्यः) अनुनय द्वारा प्रसन्न करने योग्य हो ॥५॥
भावार्थ - जिस विशुद्ध परमात्मा में पाप की कणिका भी नहीं है, वह उपासकों को निर्मल करके पवित्र आनन्दरस से तृप्त करता है ॥५॥
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