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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1007
ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्रः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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ता꣡ अ꣢स्य꣣ न꣡म꣢सा꣣ स꣡हः꣢ सप꣣र्य꣢न्ति꣣ प्र꣡चे꣢तसः । व्र꣣ता꣡न्य꣢स्य सश्चिरे पु꣣रू꣡णि꣢ पू꣣र्व꣡चि꣢त्तये꣣ व꣢स्वी꣣र꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥१००७॥

स्वर सहित पद पाठ

ताः । अ꣣स्य । न꣡म꣢꣯सा । स꣡हः꣢꣯ । स꣣प꣡र्यन्ति꣢ । प्र꣡चे꣢꣯तसः । प्र । चे꣣तसः । व्रता꣡नि꣢ । अ꣣स्य । सश्चिरे । पुरू꣡णि꣢ । पू꣣र्व꣡चि꣢त्तये । पू꣣र्व꣢ । चि꣣त्तये । वस्वीः । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज्य꣢꣯म् ॥१००७॥


स्वर रहित मन्त्र

ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः । व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१००७॥


स्वर रहित पद पाठ

ताः । अस्य । नमसा । सहः । सपर्यन्ति । प्रचेतसः । प्र । चेतसः । व्रतानि । अस्य । सश्चिरे । पुरूणि । पूर्वचित्तये । पूर्व । चित्तये । वस्वीः । अनु । स्वराज्यम् । स्व । राज्यम् ॥१००७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1007
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

१. (ताः) = वेदवाणियाँ (अस्य) = इस (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले प्रभु के (सहः) = बल का (नमसा) = नमन के साथ (सपर्यन्ति) = पूजन करती हैं, अर्थात् वेदवाणियों को अपनानेवाले 'गोतम राहूगण' प्रभु की शक्ति की उपासना करते हैं । २. ये लोग (पूर्वचित्तये) = पूर्ण ज्ञान की प्राप्त के लिए (अस्य) = इस प्रभु के (पुरूणि) = पालक व पूरक (व्रतानि) = कर्मों का सश्चिरे सेवन करते हैं । वेदवाणी का अध्ययन करते हुए ये प्रभु के ('दया-न्याय') = आदि व्रतों को अपनाते हैं, जिससे उनका ज्ञान पूर्णता की ओर बढ़नेवाला हो। ३. (वस्वीः) = उत्तम निवास की कारणभूत ये वेदवाणियाँ (स्वराज्यम् अनु) = स्वराज्य का लक्ष्य करके प्रवृत्त होती हैं, इनका अध्ययन हमें जितेन्द्रिय बनाता है— इन्द्रियों का दास न बनाकर हमें मोक्ष-लाभ कराता है ।

भावार्थ -

१. वेदवाणियों के अध्ययन से हमें पता लग जाता है कि सब शक्ति प्रभु की है, अतः मनुष्य को गर्व नहीं होने पाता, २. हम प्रभु के व्रतों को अपने जीवन में अनूदित करते हैं ३. और स्वराज्य पूर्ण जितेन्द्रियता को अपना लक्ष्य बनाते हैं।

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