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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1017
ऋषिः - रेभसूनू काश्यपौ
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
3
त्वा꣡ꣳ रि꣢꣯हन्ति धी꣣त꣢यो꣣ ह꣡रिं꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । व꣣त्सं꣢ जा꣣तं꣢꣫ न मा꣣त꣢रः꣣ प꣡व꣢मा꣣न वि꣡ध꣢र्मणि ॥१०१७॥
स्वर सहित पद पाठत्वाम् । रि꣣हन्ति । धीत꣡यः꣢ । ह꣡रि꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣द्रु꣡हः꣢ । अ꣣ । द्रु꣡हः꣢꣯ । व꣡त्स꣢म् । जा꣣त꣢म् । न । मा꣣त꣡रः꣢ । प꣡वमा꣢꣯न । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि ॥१०१७॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वाꣳ रिहन्ति धीतयो हरिं पवित्रे अद्रुहः । वत्सं जातं न मातरः पवमान विधर्मणि ॥१०१७॥
स्वर रहित पद पाठ
त्वाम् । रिहन्ति । धीतयः । हरिम् । पवित्रे । अद्रुहः । अ । द्रुहः । वत्सम् । जातम् । न । मातरः । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि ॥१०१७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1017
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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विषय - ध्यान, अद्रोह, निर्माण
पदार्थ -
हे (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले प्रभो ! (हरिम्) = सब दुःखों व पापों के हरनेवाले (त्वाम्) = आपको (पवित्रे) = वासनाओं से शून्य - निर्मल हृदय में (धीतयः) = ध्यानशील, (अद्रुहः) = किसी का द्रोह न करनेवाले, (मातरः) = सदा निर्माण के कार्यों में लगे हुए (रिहन्ति) = पूजते हैं [नि० ३.१४.११], आपके दर्शन का रसास्वादन करते हैं, उसी प्रकार (न) = जैसे (जातं वत्सम्) = उत्पन्न हुए हुए वत्स को देखकर (मातर:) = माताएँ (रिहन्ति) = आनन्दित होती हैं। ये लोग प्रभु का इस प्रकार अर्चन इसलिए करते हैं कि (विधर्मणि) = विशिष्टरूप से अपना धारण कर सकें। जीवन में वासनाओं का सतत आक्रमण हो रहा है, उस आक्रमण से प्रभु-चिन्तन ही मनुष्य को बचाता है । इस धारण के निमित्त वे प्रभु का ध्यान करते हैं ।
एवं, यह प्रभु का अर्चन करनेवाला 'रेभ' - स्तोता है, प्रभु - प्रेरणा को सुनने के कारण 'सूनू' और वासना - विनाश के कारण यह 'काश्यप ' ज्ञानी तो है ही।
भावार्थ -
हम ध्यान, अद्रोह व निर्माण के द्वारा प्रभु का पूजन करें। वे हमारे पापों को हरेंगे और विशिष्टरूप से हमारा धारण करेंगे ।
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