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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 102
ऋषिः - इरिम्बिठिः काण्वः
देवता - अदितिः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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उ꣣त꣢꣫ स्या नो꣣ दि꣡वा꣢ म꣣ति꣡रदि꣢꣯तिरू꣣त्या꣡ग꣢मत् । सा꣡ शन्ता꣢꣯ता꣣ म꣡य꣢स्कर꣣द꣢प꣣ स्रि꣣धः꣢ ॥१०२॥
स्वर सहित पद पाठउ꣣त꣢ । स्या । नः꣣ । दि꣡वा꣢꣯ । म꣣तिः꣢ । अ꣡दि꣢꣯तिः । अ । दि꣣तिः । ऊत्या꣢ । आ । ग꣢मत् । सा꣢ । श꣡न्ता꣢꣯ता । शम् । ता꣣ता । म꣡यः꣢꣯ । क꣣रत् । अ꣡प꣢꣯ । स्रि꣡धः꣢꣯ ॥१०२॥
स्वर रहित मन्त्र
उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्यागमत् । सा शन्ताता मयस्करदप स्रिधः ॥१०२॥
स्वर रहित पद पाठ
उत । स्या । नः । दिवा । मतिः । अदितिः । अ । दितिः । ऊत्या । आ । गमत् । सा । शन्ताता । शम् । ताता । मयः । करत् । अप । स्रिधः ॥१०२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 102
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 11;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 11;
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विषय - मेधा के साथ मननशीलता
पदार्थ -
(उत)=और (न:)=हमें (स्या) = वह (मतिः) = विचारशीलता (आगमत्) = प्राप्त हो, जोकि (ऊत्यै)=रक्षा के लिए होती है। (“अविवेकः परमापदां पदम्") - अविवेक सब आपत्तियों का आधार है। जब मनुष्य विचारकर कार्य करता है तो शुभ को ही प्राप्त होता है। मनुष्य तो है ही वह जो (“मत्वा कर्माणि सीव्यति”)=विचारकर कर्म करता है।
यह विचारशीलता दिवा = दिन के समान प्रकाशमय [as bright as day ] है । इस प्रकाश में हमें अपने कर्त्तव्य का मार्ग स्पष्ट दीखता है। यह विचारशीलता अदितिः-अखण्डन-अहिंसा का कारण है। इससे हमारी हिंसा नहीं होती। मार्ग अन्धकारमय न होने से हमें ठोकर नहीं लगती।
(सा)= वह (मतिः) = विचारशीलता (शन्ताता) = शान्ति का विस्तार करनेवाली होती है। मन में शान्ति के कारण सारा नाड़ीसंस्थान ठीक कार्य करता है और हमारा शरीर नीरोग व सुखी होता है, अतः यह मति शान्ति के विस्तार के द्वारा (मय:)=सुख (करत) = प्रदान करती है। विचारशीलता से हम बदले की भावना से दूर हो जाते हैं और यह मति हमें स्(त्रिध:)=हानि पहुँचाने की वृत्तियों से (अप) = दूर करती हैं। विचारने पर मनुष्य इससे ऊपर उठता है और शान्ति व सुख को प्राप्त करता है। बदला तो क्या लेना, उसका हृदय अविचारशील लोगों के लिए करुणा से आर्द्र होता है। सभी महापुरुषों ने अपना अन्त करनेवालों के शुभ की ही कामना की। इनका (बिठ)= हृदयान्तरिक्ष (इरि)= दया के जल से आर्द्र होता है, अतः ये "इरिम्बिठि " कहलाते हैं और इस मन्त्र के ऋषि होते हैं।
भावार्थ -
हम विचारशील बनें, जिससे शान्ति व सुख का लाभ करते हुए हम घृणा की वृत्ति से सदा दूर रहें।
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