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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1020
ऋषिः - मन्युर्वासिष्ठः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
2
अ꣢ध꣣ धा꣡र꣢या꣣ म꣡ध्वा꣢ पृचा꣣न꣢स्ति꣣रो꣡ रोम꣢꣯ पवते꣣ अ꣡द्रि꣢दुग्धः । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य स꣣ख्यं꣡ जु꣢षा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ मत्स꣣रो꣡ मदा꣢꣯य ॥१०२०॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡ध꣢꣯ । धा꣡र꣢꣯या । म꣡ध्वा꣢꣯ । पृ꣣चानः꣢ । ति꣣रः꣢ । रो꣣म꣢꣯ । प꣣वते । अ꣡द्रि꣢꣯दुग्धः । अ꣡द्रि꣢꣯ । दु꣣ग्धः । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । जु꣣षाणः꣢ । दे꣢वः꣢ । दे꣣व꣡स्य꣢ । म꣣त्सरः꣢ । म꣡दाय꣢꣯ ॥१०२०॥
स्वर रहित मन्त्र
अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः । इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय ॥१०२०॥
स्वर रहित पद पाठ
अध । धारया । मध्वा । पृचानः । तिरः । रोम । पवते । अद्रिदुग्धः । अद्रि । दुग्धः । इन्दुः । इन्द्रस्य । सख्यम् । स । ख्यम् । जुषाणः । देवः । देवस्य । मत्सरः । मदाय ॥१०२०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1020
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
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विषय - वासिष्ठ मन्यु का जीवन
पदार्थ -
(अध) = अब ज्ञीनी व वशी बना हुआ यह १. (धारया) = वेदवाणी से तथा २. (मध्वा) = (पृचान:) = संपृक्त हुआ, ३. (अद्रिदुग्ध:) = [ अद्रय: आदरणीयाः – नि० ९.८, दुह प्रपूरणे] आदरणीय आचार्यों द्वारा ज्ञान से प्रपूरित किया हुआ, ४. (तिरः रोम) = तिरः = प्राप्त – [नि० ३.२०] प्राप्त शब्द [रु शब्दे] को, अर्थात् वेदज्ञान को (पवते) = लोकहित के लिए लोगों को प्राप्त कराता है, अर्थात् जैसे ज्ञानी आचार्यों ने इसमें ज्ञान का पूरण किया था, उसी प्रकार यह भी औरों के प्रति उस ज्ञान को प्राप्त कराता है। ५. इस लोकहित के कार्य से यह (इन्दुः) = सोमरक्षा द्वारा शक्तिशाली बनता हुआ उस सर्वशक्तिमान् प्रभु के (सख्यम्) = मित्रभाव का (जुषाण:) = सेवन करनेवाला होता है। लोकहित-कार्यों में लगे रहने से यह संयमी जीवनवाला बनता है और संयम के कारण शक्ति-सञ्चय करके 'इन्दु' होता है । यह इन्दु ही इन्द्र की मित्रता का अधिकारी होता है । ६. (देवः) = प्रभु की मित्रता से यह दिव्य गुणोंवाला होता है और देव बनकर (देवस्य) = यह उस महान् देव परमात्मा का ही हो जाता है। ७. यह (मत्सर:) = आनन्दपूर्वक कर्मों में सरण करनेवाला होता है और परिणामत: ८. (मदाय) = अलौकिक आनन्द - लाभ के लिए होता है, अर्थात् अनुपम सुख का अनुभव करता है ।
भावार्थ -
हम वशी व ज्ञानी बनकर प्राप्त ज्ञान का प्रचार करने में आनन्द लें ।
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