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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1068
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - आदित्याः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
रा꣣या꣡ हि꣢रण्य꣣या꣢ म꣣ति꣢रि꣣य꣡म꣢वृ꣣का꣢य꣣ श꣡व꣢से । इ꣣यं꣡ विप्रा꣢꣯ मे꣣ध꣡सा꣢तये ॥१०६८॥
स्वर सहित पद पाठरा꣡या꣢ । हि꣣रण्यया꣢ । म꣣तिः꣢ । इ꣣य꣢म् । अ꣣वृका꣡य꣢ । अ꣣ । वृका꣡य꣢ । श꣡व꣢꣯से । इ꣣य꣢म् । वि꣡प्रा꣢꣯ । वि । प्रा꣣ । मेध꣡सा꣢तये । मे꣣ध꣢ । सा꣣तये ॥१०६८॥
स्वर रहित मन्त्र
राया हिरण्यया मतिरियमवृकाय शवसे । इयं विप्रा मेधसातये ॥१०६८॥
स्वर रहित पद पाठ
राया । हिरण्यया । मतिः । इयम् । अवृकाय । अ । वृकाय । शवसे । इयम् । विप्रा । वि । प्रा । मेधसातये । मेध । सातये ॥१०६८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1068
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - शक्ति+मति
पदार्थ -
प्राणापान की साधना से वीर्य सुरक्षित होता है । इसके साथ ही एक मननशक्ति भी प्राप्त होती है, जिसके कारण मनुष्य अपनी शक्ति का प्रयोग हिंसा के लिए नहीं करता । मन्त्र में कहते हैं (हिरण्यया राया) = वीर्यरूप सम्पत्ति के साथ (इयं मतिः) = यह बुद्धि व विचारशक्ति भी मिलती है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य (अवृकाय) = औरों के जीवन का आदान न करनेवाले, अर्थात् अहिंसक (शवसे) = बल के लिए होता है । वह शक्ति तो प्राप्त करता है, परन्तु उसकी शक्ति संहार के लिए नहीं होती ।
(इयम्) = यह मति और शक्ति (विप्रा) = विशेषरूप से वसिष्ठ के जीवन का पूरण करनेवाली होती है और अन्त में (मेधसातये) = उस यज्ञरूप प्रभु की प्राप्ति के लिए होती है। संक्षेप में प्राणापान [मित्र+वरुण] की साधना के निम्न लाभ हैं – १. वीर्य सम्पत्ति प्राप्त होती है [राया हिरण्यया] । २. मननशक्ति बढ़ती है- मनुष्य विचारशील बनता है [मतिः] । ३. इस प्राणसाधक का बल रक्षक होता है न कि हिंसक [अवृकाय शवसे] । ४. यह जीवन की न्यूनताओं को दूर करनेवाली होती है, ५. अन्त में प्रभु को प्राप्त कराती है।
भावार्थ -
हम प्राणसाधना द्वारा शक्ति व मति को प्राप्त करनेवाले बनें ।
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