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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1067
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - आदित्याः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
प्र꣡ति꣢ वा꣣ꣳसू꣢र꣣ उ꣡दि꣢ते मि꣣त्रं꣡ गृ꣢णीषे꣣ व꣡रु꣢णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢ꣳ रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣡ति꣢꣯ । वा꣣म् । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । मित्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । गृ꣣णीषे । व꣡रु꣢꣯णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢म् । रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रति वाꣳसूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम् । अर्यमणꣳ रिशादसम् ॥१०६७॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रति । वाम् । सूरे । उदिते । उत् । इते । मित्रम् । मि । त्रम् । गृणीषे । वरुणम् । अर्यमणम् । रिशादसम् ॥१०६७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1067
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - मित्र व वरुण का स्तवन
पदार्थ -
वैदिक योगशास्त्र में 'मित्र' प्राण है और 'वरुण' अपान है । प्राणापान की साधना के द्वारा अपने पर वश करनेवाला वसिष्ठ ' मैत्रावरुणि' है । प्रस्तुत मन्त्रों का यही ऋषि है। यह प्राणापान को ही सम्बोधित करके कहता है कि (वाम्) = आप दोनों में से (प्रति सूरे उदिते) = प्रतिदिन सूर्योदय के समय (मित्रम्) = प्राण ही (अर्यमणम्) = [अरीन् नियच्छति–नि० ११.२३] कामादि शत्रुओं का संहार करता है और [अर्यमेति तमाहुः यो ददाति – तै० १.१.२] शक्ति देता है, इस रूप में (गृणीषे) = स्तुति करता हूँ। (वरुणम्) = अपान का [अपानो वरुणः – शत० ८.४.२.६] (रिशादसम्) = 'हिंसकों का खा जानेवाला है अथवा हिंसकों का नाश करनेवाला है', इस रूप में [गृणीषे] स्तवन करता हूँ । प्राण शक्ति देता है, तो अपान दोषों को दूर करता है। इन प्राणापानों की इस रूप में स्तुति करता हुआ वसिष्ठ प्राणापान की साधना करता है। इनकी साधना करके वह उत्तम जीवनवाला ‘वसिष्ठ'=अतिशयेन वसुमान् बनता है।
भावार्थ -
प्राणापान की साधना से नीरोगता, निर्मलता व बुद्धि की विशिष्टता प्राप्त होती हैं।
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