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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1075
ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः
देवता - इन्द्राग्नी
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
इ꣣दं꣡ वां꣢ मदि꣣रं꣡ मध्वधु꣢꣯क्ष꣣न्न꣡द्रि꣢भि꣣र्न꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७५॥
स्वर सहित पद पाठइ꣣द꣢म् । वा꣣म् । मदिर꣢म् । म꣡धु꣢꣯ । अ꣡धु꣢꣯क्षन् । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । न꣡रः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । बो꣣धतम् ॥१०७५॥
स्वर रहित मन्त्र
इदं वां मदिरं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः । इन्द्राग्नी तस्य बोधतम् ॥१०७५॥
स्वर रहित पद पाठ
इदम् । वाम् । मदिरम् । मधु । अधुक्षन् । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । नरः । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । तस्य । बोधतम् ॥१०७५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1075
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - मधुविद्या व ब्रह्मदर्शन
पदार्थ -
शरीर में उत्पन्न सोम को 'मधु' कहते हैं । इस सोम से जीवन में एक उल्लास पैदा होता है, अतः इस मधु को ‘मदिर' कहा गया है । इस सोम की रक्षा से ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञान भी प्राप्त होता है, इस सोमज्ञान को ही 'मधुविद्या' के नाम से कहा गया है । यह मधुविद्या' अश्विनी देवों' [प्राणापानौ] को ही दी गयी है। इसका अभिप्राय यही है कि प्राणापान की साधना से इसे हम प्राप्त कर पाते हैं, अत: यहाँ मन्त्र में कहते हैं कि (इदम्) = इस (वाम्) = आपके (मदिरम्) = जीवन में उल्लास पैदा करनेवाले (मधु) = ब्रह्मज्ञान को (नरः) = जीवन-पथ पर आगे बढ़नेवाले लोग (अद्रिभिः) = आदरणीय गुरुओं की सहायता से (अधुक्षन्) = अपने में दूहते हैं—अपने मस्तिष्क को उस ज्ञान से परिपूर्ण करते हैं।
हे (इन्द्राग्नी) = प्राणापानो ! इस प्रकार आप हमें (तस्य) = उस सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म का (बोधतम्) = ज्ञान दो।
भावार्थ -
प्राणापान की साधना हमें आदरणीय गुरुओं से मधुविद्या को प्राप्त करने योग्य बनाए और हम प्रभु का दर्शन करनेवाले बनें ।
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