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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1077
ऋषिः - कश्यपो मारीचः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
तं꣢ त्वा꣣ वि꣡प्रा꣢ वचो꣣वि꣢दः꣣ प꣡रि꣢ष्कृण्वन्ति धर्ण꣣सि꣢म् । सं꣡ त्वा꣢ मृजन्त्या꣣य꣡वः꣢ ॥१०७७॥
स्वर सहित पद पाठतम् । त्वा꣣ । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । वचो । वि꣡दः꣢ । व꣣चः । वि꣡दः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । कृ꣣ण्वन्ति । धर्णसि꣢म् । सम् । त्वा꣣ । मृजन्ति । आय꣡वः꣢ ॥१०७७॥
स्वर रहित मन्त्र
तं त्वा विप्रा वचोविदः परिष्कृण्वन्ति धर्णसिम् । सं त्वा मृजन्त्यायवः ॥१०७७॥
स्वर रहित पद पाठ
तम् । त्वा । विप्राः । वि । प्राः । वचो । विदः । वचः । विदः । परि । कृण्वन्ति । धर्णसिम् । सम् । त्वा । मृजन्ति । आयवः ॥१०७७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1077
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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पदार्थ -
(धर्णसिम्) = सारे ब्रह्माण्ड के धारण करनेवाले (तम्) = उस (त्वा) = आपको (विप्राः) = सोम-संयम के द्वारा अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले (वचोविदः) = वेदवाणी को जाननेवाले लोग (परिष्कृण्वन्ति) = परिष्कृत करते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपने कमरे में चित्रों को सजा देता है, इसी प्रकार ये वचोवित् विप्र अपने हृदयान्तरिक्ष में प्रभु को सजा देते हैं, अर्थात् अपने हृदय में प्रभु का साक्षात्कार कर पाते हैं । (त्वा) = आपको (आयवः) = [एति] निरन्तर गतिशील व्यक्ति (संमृजन्ति) = सम्यक्तया शुद्ध करते हैं। प्रभु का शोधन [खोजना], प्रभु का ही विचार व दर्शन है । यह प्रभु-दर्शन क्रियाशील व्यक्तियों को ही प्राप्त होता है। क्रियाशीलता हमें पवित्र करती है और पवित्रता हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाती है । मलों को मारकर यह 'मारीच' बनता है और प्रभु-दर्शन करने के कारण ‘कश्यप' कहलाता है। एवं, यह प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कश्यप मारीच' बनता है ।
भावार्थ -
हम अपना पूरण करनेवाले [विप्र], वेदवाणी को जाननेवाले [वचोविद्] तथा क्रियाशील जीवनवाले [आयु] बनें और प्रभु का दर्शन करें।
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