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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1080
ऋषिः - सप्तर्षयः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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पु꣣नानो꣢꣫ वारे꣣ प꣡व꣢मानो अ꣣व्य꣢ये꣣ वृ꣡षो꣢ अचिक्रद꣣द्व꣡ने꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢ꣳ सोम पवमान निष्कृ꣣तं꣡ गोभि꣢꣯रञ्जा꣣नो꣡ अ꣢र्षसि ॥१०८०

स्वर सहित पद पाठ

पुनानः꣢ । वा꣡रे꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानः । अ꣡व्य꣡ये꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । उ꣣ । अचिक्रदत् । व꣡ने꣢꣯ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । सो꣣म । पवमान । निष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् । गो꣡भिः꣢꣯ । अ꣣ञ्जानः꣢ । अ꣣र्षसि ॥१०८०॥


स्वर रहित मन्त्र

पुनानो वारे पवमानो अव्यये वृषो अचिक्रदद्वने । देवानाꣳ सोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि ॥१०८०


स्वर रहित पद पाठ

पुनानः । वारे । पवमानः । अव्यये । वृषा । उ । अचिक्रदत् । वने । देवानाम् । सोम । पवमान । निष्कृतम् । निः । कृतम् । गोभिः । अञ्जानः । अर्षसि ॥१०८०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1080
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 12; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

१. (वारे) = सब वासनाओं का निवारण करनेवाले वरणीय प्रभु में (पुनान:) = अपने को पवित्र करता हुआ। प्रभु-स्मरण से वासनाओं का विनाश होकर जीवन पवित्र बनता है । २. (अव्यये) = उस विविध योनियों में न जानेवाले [अ+वि+अय] एकरस प्रभु में (पवमानः) = गति करता हुआ, अर्थात् प्रभुस्मरणपूर्वक सब कार्यों को करता हुआ और अतएव प्रभु की ओर जाता हुआ । ३. (वृष:) = [ वृषो हि भगवान् धर्मः ] मूर्त्तिमान् धर्म बनकर । ४. (वने) = उस वननीय–सम्भजनीय प्रभु का (अचिक्रदद्) = आह्वान करता है, अर्थात् उस उपास्य प्रभु को सदा पुकारता है । ५. हे (सोम) = शान्त स्वभाववाले (पवमान) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले ! तू ६. (गोभी:) = वेदवाणियों के द्वारा (अञ्जानः) = अपने जीवन को अलंकृत करता हुआ ७. (देवानाम्) = देवों के (निष्कृतम्) = [निष्कृ-free from sin] पापशून्य पवित्र स्थान को (अर्षसि) = प्राप्त होता है । इन सात बातों को अपने जीवनों में घटानेवाले हम' भारद्वाज, कश्यप, गोतम, अत्रि, विश्वामित्र, जमदग्नि व वसिष्ठ' बनें ।

भावार्थ -

हम अपने जीवनों को पवित्र करके देवों के पवित्र स्थान को प्राप्त करें ।

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