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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1133
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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अ꣢व्या꣣ वा꣢रे꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यो꣢꣫ हरि꣣र्व꣡ने꣢षु सीदति । रे꣣भो꣡ व꣢नुष्यते म꣣ती꣢ ॥११३३॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣡व्या꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣यः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । सी꣣दति । रेभः꣢ । व꣣नुष्यते । मती꣣ ॥११३३॥


स्वर रहित मन्त्र

अव्या वारे परि प्रियो हरिर्वनेषु सीदति । रेभो वनुष्यते मती ॥११३३॥


स्वर रहित पद पाठ

अव्या । वारे । परि । प्रियः । हरिः । वनेषु । सीदति । रेभः । वनुष्यते । मती ॥११३३॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1133
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 6
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 6
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पदार्थ -

१. गड़रियों को जैसे अपनी भेड़ें प्रिय होती हैं, इसी प्रकार वे प्रभु भी (अव्याः वारे) = भेड़ों = प्राणिमात्र के इस झुण्ड में [अवि=an ewe, वार=flock] (परि प्रियः) = सब ओर प्रेमवाले हैं। प्रभु किस प्राणी से प्रेम नहीं करते ? २. (हरिः) = ये दुःखों को हरनेवाले प्रभु (वनेषु) = उपासकों में – भक्तों में (सीदति) = विराजमान होते हैं । सर्वव्यापकता के नाते सबमें निवास करते हैं, ३. (रेभः) = ये स्तोता ही (मती) = [मत्या] बुद्धि के द्वारा उस प्रभु को (वनुष्यते) प्राप्त करता है । जैसे रूप का ग्रहण आँख से होता है, शब्द का श्रोत्र से, इसी प्रकार प्रभु का ग्रहण बुद्धि से होता है [दृश्यते त्वग्य्रया बुद्ध्या], क्योंकि यह स्तोता भक्त ही प्रभु का ग्रहण करता है, अतः प्रभु इसी के हृदय में विराजमान होते हैं । 

भावार्थ -

हम प्रभु की प्रिय भेड़ें हों। हम भक्त बनें, जिससे हमारा हृदय प्रभु का आसन बने।

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