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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1179
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
पु꣣नाना꣡स꣢श्चमू꣣ष꣢दो꣣ ग꣡च्छ꣢न्तो वा꣣यु꣢म꣣श्वि꣡ना꣢ । ते꣡ नो꣢ धत्त सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७९॥
स्वर सहित पद पाठपु꣣नाना꣡सः꣢ । च꣣मूष꣡दः꣢ । च꣣मू । स꣡दः꣢꣯ । ग꣡च्छ꣢꣯न्तः । वा꣣यु꣢म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । ते । नः꣣ । धत्त । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११७९॥
स्वर रहित मन्त्र
पुनानासश्चमूषदो गच्छन्तो वायुमश्विना । ते नो धत्त सुवीर्यम् ॥११७९॥
स्वर रहित पद पाठ
पुनानासः । चमूषदः । चमू । सदः । गच्छन्तः । वायुम् । अश्विना । ते । नः । धत्त । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११७९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1179
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - पवित्रता, प्रभु-प्राप्ति व शक्ति-लाभ
पदार्थ -
हे सोमो! १. (पुनानासः) = हमारे जीवनों को पवित्र करते हुए । इन सोमकणों से जहाँ शरीर नीरोग होता है, वहाँ साथ ही मनोवृत्ति भी सुन्दर बनती है । एवं, ये सोम हमें अधिकाधिक पवित्र बनाते चलते हैं।
२. (चमूषदः) = द्यावापृथिवी में स्थिर होनेवाले, अर्थात् हम प्रयत्न करके इन सोमकणों को शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें । मस्तिष्क तक आकर ये हमारी ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाले हों ।
३. (अश्विना) = प्राणापानों के द्वारा (वायुम्) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले [वा गतौ] प्रभु की ओर (गच्छन्तः) = जाते हुए । प्राणापान की साधना से ये सोमकण शरीर में सुरक्षित होते है। इनकी ऊर्ध्वगति होती है। ये हमारी बुद्धि को सूक्ष्म बनाते है और हम प्रभुदर्शन कर पाते हैं।
४. हे सोमो! (ते) = वे आप (नः) = हममें (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को (धत्त) = धारण कीजिए ।
भावार्थ -
शरीर में प्राणापान की साधना से सोम की ऊर्ध्वगति होती है। ये सोम १. हमें पवित्र बनाते हैं, २. प्रभु की ओर ले जाते हैं, ३. शक्ति प्राप्त कराते हैं ।
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