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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1234
ऋषिः - भर्गः प्रागाथः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
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त꣢꣫ꣳ हि स्व꣣रा꣡जं꣢ वृष꣣भं꣡ तमोज꣢꣯सा धि꣣ष꣡णे꣢ निष्टत꣣क्ष꣡तुः꣢ । उ꣣तो꣢प꣣मा꣡नां꣢ प्रथ꣣मो꣡ नि षी꣢꣯दसि꣣ सो꣡म꣢काम꣣ꣳ हि꣢ ꣣ते म꣡नः꣢ ॥१२३४॥
स्वर सहित पद पाठत꣢म् । हि । स्व꣣रा꣡ज꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज꣢꣯म् । वृ꣣षभ꣢म् । तम् । ओ꣡ज꣢꣯सा । धि꣣ष꣡णे꣣इ꣡ति꣢ । नि꣣ष्टतक्ष꣡तुः꣢ । निः꣣ । ततक्ष꣡तुः꣢ । उ꣣त꣢ । उ꣣पमा꣡ना꣢म् । उ꣣प । मा꣡ना꣢꣯म् । प्र꣣थमः꣢ । नि । सी꣣दसि । सो꣡म꣢꣯कामम् । सो꣡म꣢꣯ । का꣣मम् । हि꣢ । ते꣣ । म꣡नः꣢꣯ ॥१२३४॥
स्वर रहित मन्त्र
तꣳ हि स्वराजं वृषभं तमोजसा धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामꣳ हि ते मनः ॥१२३४॥
स्वर रहित पद पाठ
तम् । हि । स्वराजम् । स्व । राजम् । वृषभम् । तम् । ओजसा । धिषणेइति । निष्टतक्षतुः । निः । ततक्षतुः । उत । उपमानाम् । उप । मानाम् । प्रथमः । नि । सीदसि । सोमकामम् । सोम । कामम् । हि । ते । मनः ॥१२३४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1234
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 7; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 7; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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विषय - सर्व- प्रथम
पदार्थ -
(हि) = निश्चय से (तम्) = उस (स्वराजम्) = स्वयं देदीप्यमान (तम्) = उस (वृषभम्) = अत्यन्त शक्तिशाली व सब सुखों के वर्षक प्रभु को (धिषणे) = ये द्युलोक और पृथिवीलोक (ओजसा) = अपने ओज के द्वारा (निष्टतक्षतुः) = तक्ष=[form in the mind] हमारे मनों में निर्मित करते हैं, अर्थात् हम इस देदीप्यमान द्युलोक तथा अत्यन्त दृढ़ पृथिवी को देखते हैं तो हमारे मनों में उस प्रभु की कल्पना उठती है । इन सूर्यादि पिण्डों को दीप्ति प्राप्त करानेवाले प्रभु 'स्वयं देदीप्यमान' हैं— स्वराट् हैं, उन्हीं की दीप्ति से ये सब सूर्य, अग्नि, विद्युत् व नक्षत्र चमक रहे हैं। ये पृथिवी किस प्रकार माता के समान हमपर सब सुखों का वर्षण कर रही है – पृथिवी में इस उत्पादक शक्ति को रखनेवाले वे प्रभु ही वस्तुतः ‘वृषभ' है। इस प्रकार इस पृथिवी व द्युलोक का ओज हमें प्रभु का स्मरण कराता है।
इस प्रकार प्रभु का स्मरण करनेवाला ‘भर्ग प्रागाथ'=तेजस्वी, प्रभु का स्तोता, प्रभु का स्तवन करता हुआ कहता है कि (उत) = और (उपमानाम्) = उपमेय पदार्थों में आप (प्रथमः निषीदसि) = सर्वप्रथम स्थान में स्थित होते हैं । ज्ञानियों में आप सर्वाधिक ज्ञानी हैं तो तेजस्वियों में सर्वाधिक तेजस्वी । वस्तुत: बलवानों के बल आप ही हैं और बुद्धिमानों को बुद्धि आपसे ही दी जाती है ।
हे प्रभो! (ते मनः) = आपका मन हि निश्चय से (सोमकामम्) = सौम्य पुरुष को चाहनेवाला है । सौम्य पुरुष को ही आप मनुष्य से ऋषि बना देते हैं ।
भावार्थ -
वे प्रभु स्वयं देदीप्यमान व शक्तिशाली हैं। पृथिवी व द्युलोक के अन्दर प्रसृत शक्ति उसका प्रतिपादन करती है । प्रभु प्रत्येक गुण की चरमसीमा हैं। सौम्य पुरुषों को चाहते हैं|
टिप्पणी -
नोट - प्रभु के मन की कल्पना पुरुषविधता के कारण हुई है ।