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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1243
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - द्विपदा विराट् पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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दि꣣वो꣢ ध꣣र्त्ता꣡सि꣢ शु꣣क्रः꣢ पी꣣यू꣡षः꣢ स꣣त्ये꣡ विध꣢꣯र्मन्वा꣣जी꣡ प꣢वस्व ॥१२४३॥

स्वर सहित पद पाठ

दि꣣वः꣢ । ध꣣र्त्ता꣢ । अ꣣सि । शुक्रः꣢ । पी꣣यू꣡षः꣢ । स꣣त्ये꣢ । वि꣡ध꣢꣯र्मन् । वि । ध꣣र्मन् । वाजी꣢ । प꣢वस्व ॥१२४३॥


स्वर रहित मन्त्र

दिवो धर्त्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व ॥१२४३॥


स्वर रहित पद पाठ

दिवः । धर्त्ता । असि । शुक्रः । पीयूषः । सत्ये । विधर्मन् । वि । धर्मन् । वाजी । पवस्व ॥१२४३॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1243
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

हे सोम ! तू १. (दिव:) = प्रकाश का (धर्ता असि) = धारण करनेवाला है। ज्ञानाग्नि का तो ईंधन ही यह है। इसके अभाव में ज्ञानाग्नि बुझ जाती है । २. (शुक्र:) = तू दीप्तिमान् है । मन को द्वेषादि मलों से रहित करके चमका देनेवाला है। ३. (पीयूष:) = तू अमृत है। शरीर को रोगों से बचाकर तू असमय में मृत्यु का शिकार नहीं होने देता । ४. तू (सत्ये विधर्मन्) = अपने रक्षक को सत्य में धारण करनेवाला है। सोमरक्षक सत्यवादी तो होता ही है और इस सत्य का पालन करता हुआ वह सत्य प्रभु का पानेवाला बनता है । ५. (वाजी) = शक्ति देनेवाला होता हुआ तू (पवस्व) = हमारे शरीर में प्रवाहित हो । 

भावार्थ -

सोम ज्योति, नैर्मल्य व नीरोगता को देता है— सत्य हमें प्रभु में स्थापित करता है और हममें शक्ति का संचार करता है ।

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