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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1278
ऋषिः - राहूगण आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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ए꣣ष꣢꣫ स्य पी꣣त꣡ये꣢ सु꣣तो꣡ हरि꣢꣯रर्षति धर्ण꣣सिः꣢ । क्र꣢न्द꣣न्यो꣡नि꣢म꣣भि꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१२७८॥

स्वर सहित पद पाठ

ए꣣षः꣢ । स्यः । पी꣣त꣡ये꣢ । सु꣣तः꣢ । ह꣣रिः꣢꣯ । अ꣣र्षति । धर्णसिः꣢ । क्र꣡न्द꣢꣯न् । यो꣡नि꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्रि꣣य꣢म् ॥१२७८॥


स्वर रहित मन्त्र

एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः । क्रन्दन्योनिमभि प्रियम् ॥१२७८॥


स्वर रहित पद पाठ

एषः । स्यः । पीतये । सुतः । हरिः । अर्षति । धर्णसिः । क्रन्दन् । योनिम् । अभि । प्रियम् ॥१२७८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1278
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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पदार्थ -

(एषः स्यः) = यह प्रभुभक्त (पीतये)- रक्षा के लिए सुतः = [सुतम् अस्य अस्तीति] निर्माणात्मक कार्यों में लगा हुआ और इन निर्माणात्मक कार्यों के द्वारा (हरिः) = सबके दुःखों का अपहरण करनेवाला (धर्णसिः) = सबके धारण करने के स्वभाववाला (अर्षति) = गति करता है । एक प्रभुभक्त अकर्मण्य तो होता ही नहीं। अकर्मण्य न होने से ही वह अपनी रक्षा कर पाता है। आलसी को ही वासनाएँ सताती हैं। यह सदा निर्माणात्मक कार्यों में लगता है, उनके द्वारा यह कितनों ही के दुःखों को दूर करनेवाला होता है और कितनों का ही धारण-पोषण करता है ।

यह अपने इस मार्ग पर चलता हुआ (प्रियम्) = सबके प्रिय (योनिम्) = मूल कारणभूत प्रभु का (अभिक्रन्दन्) = आह्वान करता है । प्रभु की प्रार्थना इसे सशक्त बनाती है और यह अव्याकुलता से अपने निर्माण-कार्यों में लगा रहता है। किसी भी प्रकार का कोई विघ्न इसे अपने मार्ग पर बढ़ने से रोक नहीं पाता।

भावार्थ -

प्रभुभक्त सदा निर्माणात्मक कार्यों द्वारा 'सर्वभूतहिते रत:' रहता है।

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