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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1286
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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ए꣣ष꣢ क꣣वि꣢र꣣भि꣡ष्टु꣢तः प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣡धि꣢ तोशते । पु꣣ना꣢꣫नो घ्नन्नप꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥१२८६॥

स्वर सहित पद पाठ

ए꣣षः꣢ । क꣣विः꣢ । अ꣣भि꣡ष्टु꣢तः । अ꣣भि꣢ । स्तु꣣तः । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । तो꣣शते । पुनानः꣢ । घ्नन् । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥१२८६॥


स्वर रहित मन्त्र

एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते । पुनानो घ्नन्नप द्विषः ॥१२८६॥


स्वर रहित पद पाठ

एषः । कविः । अभिष्टुतः । अभि । स्तुतः । पवित्रे । अधि । तोशते । पुनानः । घ्नन् । अप । द्विषः ॥१२८६॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1286
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

पिछले मन्त्र में वर्णन था कि प्रियमेध ज्ञानी बनकर भी मनुष्यों के साथ ही निवास करनेवाला होता है— उनसे दूर नहीं भाग जाता । यह मनुष्यों के साथ निवास करने के कारण ही 'नृ-मेध'=मनुष्यों से मेलवाला कहलाता है । सदा मानव हितैषी कार्यों में लगे रहने से यह 'आङ्गिरस' शक्तिशाली बना रहता है। १. (एषः) = यह नृमेध (कवि:) = ज्ञान - सूर्योदय के कारण क्रान्तदर्शी है – वस्तुतत्त्व को जाननेवाला है। (अभिष्टुतः) = हित के कार्यों में लगे होने से सदा चारों ओर इसकी स्तुति होती है । अथवा (अभि) = दोनों ओर सोते-जागते [स्तुतमस्य] यह प्रभु का स्तवन करनेवाला होता है । २. इस प्रभु-स्तवन से यह (पवित्रे अधि) = उस पवित्र प्रभु में (तोशते) = सब कामादि वासनाओं का संहार कर देता है [तुष to kill]। ३. (पुनान:) = इस प्रकार यह अपने को निरन्तर पवित्र करता हुआ ४. (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को अपघ्नन्-अपने से दूर नष्ट कर देता है । एवं, नृमेध अपने जीवन में क्रान्तदर्शी बनकर निरन्तर प्रभु-स्तवन करता हुआ उस पवित्र प्रभु में स्थित होकर वासनाओं का विनाश कर डालता है—अपने को पवित्र कर लेता है और द्वेष की भावनाओं को दूर कर देता है।

भावार्थ -

हम प्रभु का स्मरण करें और द्वेष से दूर रहें ।

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