Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1294
ऋषिः - राहूगण आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
स꣢ वा꣣जी꣡ रो꣢च꣣नं꣢ दि꣣वः꣡ पव꣢꣯मानो꣣ वि꣡ धा꣢वति । र꣣क्षोहा꣡ वार꣢꣯म꣣व्य꣡य꣢म् ॥१२९४॥
स्वर सहित पद पाठसः । वा꣣जी꣢ । रो꣣चन꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । वि । धा꣣वति । रक्षोहा꣢ । र꣣क्षः । हा꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣣व्य꣡य꣢म् ॥१२९४॥
स्वर रहित मन्त्र
स वाजी रोचनं दिवः पवमानो वि धावति । रक्षोहा वारमव्ययम् ॥१२९४॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वाजी । रोचनम् । दिवः । पवमानः । वि । धावति । रक्षोहा । रक्षः । हा । वारम् । अव्ययम् ॥१२९४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1294
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - वाजी बनकर ' अव्यय वार' की ओर
पदार्थ -
(सः) = वह राहूगण १. (वाजी) = शक्तिशाली व गतिशील २. (दिवः) = ज्ञान की (रोचनम्) = दीप्ति को (विधावति) = विशेषरूप से प्राप्त होता है। जैसे शक्ति व गति ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हैं उसी प्रकार यह ज्ञान (पवित्रता) = प्राप्ति में सहायक होता है, अत: वह राहूगण ज्ञान को प्राप्त करके ३. (पवमानः) = 1अपने जीवन को पवित्र करनेवाला होता है। ('नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते') ज्ञान के समान कोई पवित्र करनेवाली वस्तु नहीं है। पवित्रता का स्वरूप यह है कि ये ५. (रक्षोहा) = सब राक्षसी वृत्तियों का संहार करता है, अपने रमण के लिए यह कभी औरों का क्षय नहीं करता । ६. इस प्रकार का जीवन बनाकर यह (अव्ययम्) = कभी नष्ट न होनेवाले उस (वारम्) = वरणीय, आपत्तियों के निवारण करनेवाले प्रभु की ओर विधावति विशेषरूप से जाता है ।
भावार्थ -
मैं शक्तिशाली बनकर उस अविनाशी प्रभु की ओर गतिवाला होऊँ।
इस भाष्य को एडिट करें