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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1311
ऋषिः - शतं वैखानसाः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
प꣣व꣢मानो र꣣थी꣡त꣢मः शु꣣भ्रे꣡भिः꣢ शु꣣भ्र꣡श꣢स्तमः । ह꣡रि꣢श्चन्द्रो म꣣रु꣡द्ग꣢णः ॥१३११॥
स्वर सहित पद पाठप꣡व꣢꣯मानः । र꣣थी꣡त꣢मः । शु꣣भ्रे꣡भिः꣢ । शु꣣भ्र꣡श꣢स्तमः । शु꣣भ्र꣢ । श꣣स्तमः । ह꣡रि꣢꣯श्चन्द्रः । ह꣡रि꣢꣯ । च꣣न्द्रः । मरु꣡द्ग꣢णः । म꣣रु꣢त् । ग꣣णः ॥१३११॥
स्वर रहित मन्त्र
पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः । हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः ॥१३११॥
स्वर रहित पद पाठ
पवमानः । रथीतमः । शुभ्रेभिः । शुभ्रशस्तमः । शुभ्र । शस्तमः । हरिश्चन्द्रः । हरि । चन्द्रः । मरुद्गणः । मरुत् । गणः ॥१३११॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1311
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - रथी-तम
पदार्थ -
यह वैखानस १. (पवमानः) = अपने को पवित्र करने के स्वभाववाला होता है । २. (रथीतमः) = यह सर्वोत्तम रथी होता है । शरीररूप रथ से जीवन यात्रा को पूर्ण करनेवालों में सर्वोत्तम होता है । ३. (शुभ्रेभिः) = शुभ्र गुणों से यह (शुभ्रशस्तमः) = अति शुभ्र-अत्यन्त प्रकाशमान् होता है । ४. (हरिः) = यह सदा इन्द्रियवृत्तियों को मनरूप लगाम द्वारा प्रत्याहृत करनेवाला होता है । ५. (चन्द्रः) = आह्लदमय मनोवृत्तिवाला होता है । इसके चेहरे पर सदा मुस्कराहट होती है । ६. (मरुद्गणः) = [गण्-take notice of] सदा प्राणों का ध्यान करनेवाला होता है। यह प्राणों की साधना करता है जो उसके जीवन की सब अच्छाइयों का मूलकारण है ।
भावार्थ -
प्राणसाधना से हम अपने जीवन को उज्ज्वल करें ।
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