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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1318
ऋषिः - वसुर्भारद्वाजः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम -
3
क꣣वि꣡र्वे꣢ध꣣स्या꣡ पर्ये꣢꣯षि꣣ मा꣡हि꣢न꣣म꣢त्यो꣣ न꣢ मृ꣣ष्टो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्षसि । अ꣣पसे꣡ध꣢न्दुरि꣣ता꣡ सो꣢म नो मृड घृ꣣ता꣡ वसा꣢꣯नः꣣ प꣡रि꣢ यासि नि꣣र्णि꣡ज꣢म् ॥१३१८॥
स्वर सहित पद पाठक꣣विः꣢ । वे꣣धस्या꣢ । प꣡रि꣢꣯ । ए꣣षि । मा꣡हि꣢꣯नम् । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । मृ꣣ष्टः꣢ । अ꣣भि꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । अ꣣र्ष꣡सि । अपसे꣡ध꣢न् । अ꣣प । से꣡ध꣢꣯न् । दु꣣रिता꣢ । दुः꣣ । इता꣢ । सो꣣म । नः । मृड । घृता꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । प꣡रि꣢꣯ । या꣣सि । निर्णि꣡ज꣢म् । निः꣣ । नि꣡ज꣢꣯म् ॥१३१८॥
स्वर रहित मन्त्र
कविर्वेधस्या पर्येषि माहिनमत्यो न मृष्टो अभि वाजमर्षसि । अपसेधन्दुरिता सोम नो मृड घृता वसानः परि यासि निर्णिजम् ॥१३१८॥
स्वर रहित पद पाठ
कविः । वेधस्या । परि । एषि । माहिनम् । अत्यः । न । मृष्टः । अभि । वाजम् । अर्षसि । अपसेधन् । अप । सेधन् । दुरिता । दुः । इता । सोम । नः । मृड । घृता । वसानः । परि । यासि । निर्णिजम् । निः । निजम् ॥१३१८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1318
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - पूर्ण-शोधन
पदार्थ -
वसु से प्रभु कहते हैं—१. (कवि:) = गत मन्त्र में वर्णित प्रकार से ऊर्ध्वरेतस् बनने पर तू क्रान्तदर्शी बनता है— तेरी बुद्धि तीव्र होकर वस्तुतत्त्व को समझनेवाली होती है । २. (वेधस्य) = निर्माण की इच्छा से अथवा बड़ा ज्ञानी बनने की कामना से तू (माहिनम्) = अपने पर प्रभुत्व [Dominion] (पर्येषि) = प्राप्त करता है— सब इन्द्रियों, मन व प्राणक्रियाओं को वश में करनेवाला होता है । ३. अत्यः न तू निरन्तर गतिशील घोड़े के समान होता है।' (अनध्वा वाजिनां जरा') = न चलना घोड़ों के लिए बुढ़ापा है। तू भी अकर्मण्यता को अपनी जरा समझता है और निरन्तर क्रियाशील बना रहता है। ४. (मृष्टः) = अतएव [मृजू शुद्धौ] शुद्ध होता है। (‘योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये') = आत्मशुद्धि के लिए कर्म तो आवश्यक ही है । ५. (वाजम् अभि अर्षसि) - इस क्रियाशीलता से तेरे अङ्गप्रत्यङ्ग में शक्ति बनी रहती है। तू सब अङ्गों में शक्ति प्राप्त करता है । ६. (दुरिता अपसेधन्) = कर्म में लगे रहने से ही सब दुरितों को दूर करनेवाला होता है । ७. इस प्रकार के जीवनवाला तू सोम - हे 'तू' शान्त मनवाले वसो ! (न:) = हमारा बनकर, अर्थात् मेरा [प्रभु का] ही आश्रय करनेवाला होकर मृड- [to be delighted]=सुखी जीवनवाला हो। ऐसा करने पर (घृता वसान:) = तेजस्विताओं को धारण करता हुआ तू (निर्णिजम्) = शरीर, मन व बुद्धि में पूर्ण शोधन को (परियासि) = प्राप्त होता है । तेरे जीवन से अपवित्रता का सर्वथा नाश हो जाता है ।
भावार्थ -
हम प्रभु के बनकर अपना पूर्ण शोधन करनेवाले हों ।
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