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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1320
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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अ꣡ल꣢र्षिरातिं वसु꣣दा꣡मुप꣢꣯ स्तुहि भ꣣द्रा꣡ इन्द्र꣢꣯स्य रा꣣त꣡यः꣢ । यो꣡ अ꣢स्य꣣ का꣡मं꣢ विध꣣तो꣡ न रोष꣢꣯ति꣣ म꣡नो꣢ दा꣣ना꣡य꣢ चो꣣द꣡य꣢न् ॥१३२०॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣡ल꣢꣯र्षिरातिम् । अ꣡ल꣢꣯र्षि । रा꣣तिम् । वसुदा꣢म् । व꣣सु । दा꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣हि । भद्राः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । रा꣣त꣡यः꣢ । यः । अ꣣स्य । का꣡म꣢꣯म् । वि꣣धतः꣢ । न । रो꣡ष꣢꣯ति । म꣡नः꣢꣯ । दा꣣ना꣡य꣢ । चो꣣द꣡य꣢न् ॥१३२०॥


स्वर रहित मन्त्र

अलर्षिरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः । यो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन् ॥१३२०॥


स्वर रहित पद पाठ

अलर्षिरातिम् । अलर्षि । रातिम् । वसुदाम् । वसु । दाम् । उप । स्तुहि । भद्राः । इन्द्रस्य । रातयः । यः । अस्य । कामम् । विधतः । न । रोषति । मनः । दानाय । चोदयन् ॥१३२०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1320
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 10; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

गत मन्त्र में कहा था कि 'तुम सब मिलकर उस प्रभु के इन भोजनों को खाओ' [विश्वा इत् इन्द्रस्य भक्षत] । इसी भावना को कुछ विस्तार से कहते हैं । १.( रातिं अलर्षि) = हे नृमेध ! तू प्रभु से दान प्राप्त करता है। जिस सम्पत्ति को तू अपना समझता है, यह तेरे लिए प्रभु का ही दान है । २. तू (वसुदाम्) = वसु देनेवाले, धन प्राप्त करानेवाले प्रभु के दान का (उपस्तुहि) = स्तवन कर | ३. (भद्राः इन्द्रस्य रातयः) = उस प्रभु के दान सदा कल्याण करनेवाले हैं। ४. ये प्रभु वे हैं (यः) = जो (अस्य विधत:) = इस उपासक के (कामम्) = संकल्प को (न) = नहीं (रोषति) = हिंसित करते । उपासक कामना करता है। प्रभु उसकी कामना को पूर्ण करते हैं और ५. (मन: दानाय चोदयन्) = इस उपासक के मन को सदा दान के लिए प्रेरित करते हैं । 'तू दे, मैं तुझे दूँगा' यह प्रभु की प्रेरणा उपासक को प्राप्त होती रहती है । प्रभु का ही तो सब धन है, मैं उसे प्रभु की प्रजा के हित में ही क्यों न विनियुक्त करूँ ? 

भावार्थ -

देनेवाला प्रभु है । उससे दिये धन को हमें देते ही रहना चाहिए । इसी प्रकार हम 'नृमेध'= मानवमात्र के साथ सम्पर्कवाले बन सकते हैं ।

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