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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1391
ऋषिः - मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ देवता - इन्द्रः छन्दः - बृहती स्वरः - मध्यमः काण्ड नाम -
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आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१३९१॥

स्वर सहित पद पाठ

आ꣢ । त्वा꣣ । सह꣡स्र꣢म् । आ । शत꣣म्꣢ । यु꣣क्ताः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्मयु꣡जः꣢ । ब्र꣣ह्म । यु꣡जः꣢꣯ । ह꣡र꣢꣯यः । इ꣣न्द्र । केशि꣡नः꣢꣯ । व꣡ह꣢꣯न्तु । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥१३९१॥


स्वर रहित मन्त्र

आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये । ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥१३९१॥


स्वर रहित पद पाठ

आ । त्वा । सहस्रम् । आ । शतम् । युक्ताः । रथे । हिरण्यये । ब्रह्मयुजः । ब्रह्म । युजः । हरयः । इन्द्र । केशिनः । वहन्तु । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥१३९१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1391
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 2; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

२४५ संख्या पर मन्त्रार्थ इस रूप में है— मेध्यातिथि– मेध्य प्रभु की ओर जानेवाले की चित्तवृत्तियाँ ब्(रह्मयुजः) = उसे ब्रह्म से मिलानेवाली होती हैं, (केशिन:) = प्रकाशवाली होती हैं । ये (हिरण्यये रथे) = ज्योतिर्मय शरीररूप रथ में (युक्ताः) = युक्त हुई- हुई (शतं सहस्रम्) = सैकड़ों व हज़ारों चित्तवृत्तियाँ (त्वा) = तुझे (आ) = सर्वथा (सोमपीतये) = शक्ति के पान के लिए (आवहन्तु) = ले चलें । हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! (हरयः) = भटकानेवाली ये वृत्तियाँ अब न भटककर तुझे सोमपान करनेवाला बनाएँ । 

भावार्थ -

हमारी चित्तवृत्तियाँ 'हरयः' न रहकर ‘ब्रह्मयुज:' हो जाएँ। 

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