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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1400
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
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भ꣣द्रा꣡ वस्त्रा꣢꣯ सम꣣न्या꣢३꣱व꣡सा꣢नो म꣣हा꣢न्क꣣वि꣢र्नि꣣व꣡च꣢नानि꣣ श꣡ꣳस꣢न् । आ꣡ व꣢च्यस्व च꣣꣬म्वोः꣢꣯ पू꣣य꣡मा꣢नो विचक्ष꣣णो꣡ जागृ꣢꣯विर्दे꣣व꣡वी꣢तौ ॥१४००॥

स्वर सहित पद पाठ

भ꣣द्रा꣢ । व꣡स्त्रा꣢꣯ । स꣣मन्या꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । म꣣हा꣢न् । क꣣विः꣢ । नि꣣व꣡च꣢नानि । नि꣣ । व꣡च꣢꣯नानि । श꣡ꣳस꣢꣯न् । आ । व꣣च्यस्व । च꣣म्वोः꣢ । पू꣣य꣡मा꣢नः । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ । जा꣡गृ꣢꣯विः । दे꣣व꣡वी꣢तौ । दे꣣व꣢ । वी꣣तौ ॥१४००॥


स्वर रहित मन्त्र

भद्रा वस्त्रा समन्या३वसानो महान्कविर्निवचनानि शꣳसन् । आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ ॥१४००॥


स्वर रहित पद पाठ

भद्रा । वस्त्रा । समन्या । वसानः । महान् । कविः । निवचनानि । नि । वचनानि । शꣳसन् । आ । वच्यस्व । चम्वोः । पूयमानः । विचक्षणः । वि । चक्षणः । जागृविः । देववीतौ । देव । वीतौ ॥१४००॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1400
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

प्रभु कहते हैं कि हे जीव ! (देववीतौ) = दिव्य गुणों की (व्याप्ति) = प्राप्ति के निमित्त (आवच्यस्व) = तू समन्तात् गतिवाला हो । क्या करता हुआ ? १. (भद्रा) = कल्याणकर (समन्या) = संग्राम के योग्य [समन= संग्राम] अथवा व्याकुलता पैदा न करनेवाले [षम्-अवैक्लव्ये] (वस्त्रा वसानः) = वस्त्रों को धारण करता हुआ। वस्त्र ऐसे होने चाहिएँ जो [क] सरदी-गरमी से बचाकर कल्याण करें [ख] रोगों से मुक़ाबला करने के लिए उचित हों [ग] घबराहट को पदा करनेवाले न हों । एवं, शरीर की नीरोगता के दृष्टिकोण से ही वस्त्र-व्यवस्था होनी चाहिए । २. (महान्) = हृदय में महान् बनता हुआ, दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए हृदय की विशालता अत्यन्त आवश्यक है। संकुचित हृदय के साथ दिव्य गुणों का वास नहीं । ३. (कवि:) = तू क्रान्तदर्शी बन । वस्तुओं को ठीक रूप में देखनेवाले उनमें आसक्त नहीं होते और दिव्य गुणों की ओर बढ़ पाते हैं । ४. (निवचनानि) = प्रभु के गुणवर्णनात्मक वचनों का शंसन्=उच्चारण करता हुआ । ये वचन ही हमारे सामने एक उच्च लक्ष्यदृष्टि पैदा करते हैं । ५. (चम्वोः पूयमानः) = द्यावापृथिवी में, अर्थात् शरीर व मस्तिष्क में पवित्र होता हुआ । प्रभुगुण-वर्णन शरीर व मस्तिष्क दोनों को ही निर्मल बनाता है । ६. (विचक्षणः) = एक विशिष्ट दृष्टिकोणवाला । संसार में यदि हमारे जीवन का एक उत्कृष्ट दृष्टिकोण होगा तभी हम कुछ उन्नति कर पाएँगे, इसके बिना तो बहनामात्र [Drifting] होता है, उन्नति नहीं । ७. (जागृविः) = एक ऊँची लक्ष्यदृष्टि के साथ हमें सदा जागते हुए होना चाहिए, असावधानी से तो न जाने कब हम वासनाओं का शिकार हो जाएँ ?

भावार्थ -

प्रभु उपदेश के अनुसार मन्त्र वर्णित सात बातों को हम अपने जीवनों में सप्त=समवेत करने के लिए यत्नशील हों ।

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