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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1409
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
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शू꣡र꣢ग्रामः꣣ स꣡र्व꣢वीरः꣣ स꣡हा꣢वा꣣ञ्जे꣡ता पवस्व꣣ स꣡नि꣢ता꣣ ध꣡ना꣢नि । ति꣣ग्मा꣡यु꣢धः क्षि꣣प्र꣡ध꣢न्वा स꣣म꣡त्स्वषा꣢꣯ढः सा꣣ह्वा꣡न्पृत꣢꣯नासु꣣ श꣡त्रू꣢न् ॥१४०९॥

स्वर सहित पद पाठ

शू꣡र꣢꣯ग्रामः । शू꣡र꣢꣯ । ग्रा꣣मः । स꣡र्व꣢꣯वीरः । स꣡र्व꣢꣯ । वी꣣रः । स꣡हा꣢꣯वान् । जे꣡ता꣢꣯ । प꣣वस्व । स꣡नि꣢꣯ता । ध꣡ना꣢꣯नि । ति꣣ग्मा꣡यु꣢धः । ति꣣ग्म꣢ । आ꣣युधः । क्षिप्र꣡ध꣢न्वा । क्षि꣣प्र꣢ । ध꣣न्वा । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । अ꣡षा꣢꣯ढः । सा꣣ह्वा꣢न् । पृ꣡त꣢꣯नासु । श꣡त्रू꣢꣯न् ॥१४०९॥


स्वर रहित मन्त्र

शूरग्रामः सर्ववीरः सहावाञ्जेता पवस्व सनिता धनानि । तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाढः साह्वान्पृतनासु शत्रून् ॥१४०९॥


स्वर रहित पद पाठ

शूरग्रामः । शूर । ग्रामः । सर्ववीरः । सर्व । वीरः । सहावान् । जेता । पवस्व । सनिता । धनानि । तिग्मायुधः । तिग्म । आयुधः । क्षिप्रधन्वा । क्षिप्र । धन्वा । समत्सु । स । मत्सु । अषाढः । साह्वान् । पृतनासु । शत्रून् ॥१४०९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1409
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

प्रभु कहते हैं कि तू (पवस्व) = अपने जीवन को पवित्र कर अथवा मेरी ओर [आप्नुहि आगच्छ च] आ। कैसा बनकर – १. (शूरग्रामः) = शूरता का तू ग्राम बन । 'ग्राम' प्रत्यय समूह अर्थ में आता है, शूरता का तू समूह हो, अर्थात् शूरता तुझमें निवास करे। ग्राम शब्द 'ग्रस धातु से मन प्रत्यय से मन' आकर बनता है, अत: यह भी अर्थ हो सकता है कि [शृ हिंसायाम्] हिंसकों का तू ग्रसनेवाला हो । २. (सर्ववीरः) = तू पूर्ण वीर बनकर काम-क्रोधादि शत्रुओं को कम्पित करके दूर भगानेवाला हो तथा रोगों को नष्ट करनेवाला वीर्य तुझमें सुरक्षित हो । ३. (सहावान्) = तू शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहनेवाला बन । ४. (जेता) = सदा विजेता बन – पराजित होनेवाला न हो । एक-दो बार की असफलता तुझे कभी हतोत्साह न कर दे । ५. (धनानि सनिता) = धनों को तू प्राप्त करनेवाला तथा उनका संविभाग करनेवाला हो ५. (तिग्मायुधः) = तीक्षण अस्त्रोंवाला तू बन । शरीर में रोगों से लड़नेवाला प्रभु-स्मरणरूप अस्त्र है तथा बुद्धि में कुविचार को दूर करनेवाला तर्करूप अस्त्र है । तेरे ये सब अस्त्र तीव्र हों। ७. (क्षिप्रधन्वा) = शत्रुओं को दूर फेंकनेवाला [ क्षिप्र], प्रणवरूप धनुष लिये हुए [ प्रणवो धनुः] । जहाँ प्रणव=ओ३म् का उच्चारण है वहाँ से शत्रु शीघ्र ही दूर प्रेरित होते हैं – भगा दिये जाते हैं । ८. (समत्सु अषाढः) = प्रणवरूप धनुष के कारण ही यह कामादि के साथ संग्राम में अधर्षणीय होता है। आ वृत्तियाँ इसका धर्षण नहीं कर पातीं। ९. यह (पृतनासु) = संग्रामों में (शत्रून्) = शत्रुओं का (साह्वान्) = मर्षण करनेवाला होता है— इन्हें यह कुचल डालता है।

यहाँ मन्त्र में ‘शूरग्राम:' = बाह्य शत्रुओं के नाश का संकेत करता है, ‘सर्ववीर: ' रोगों के नाश का । सहावान्– शीतोष्णादि के सहने का सूचक है और जेता - विजयी होने का । 'सनिता धनानि ' से धनों की प्राप्ति व संविभाग कहे जा रहे हैं । 'तिग्मायुधः' से इन्द्रिय, मन व बुद्धि की तीव्रता का उल्लेख हुआ है, ‘क्षिप्रधन्वा' से प्रणवरूप धनुष को अपनाने का । ऐसा होने पर यह व्यक्ति संग्रामों में अधर्षणीय बनता है और शत्रुओं का मर्षण कर डालता है। ऐसा करने पर जीवन पवित्र होता है और यही व्यक्ति प्रभु की ओर जाने का अधिकारी होता है।

भावार्थ -

उल्लिखित नौ बातों को अपनाकर हम जीवन को पवित्र बनाएँ और प्रभु की ओर चलें ।
 

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