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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1417
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
स꣡ वाजं꣢꣯ वि꣣श्व꣡च꣢र्षणि꣣र꣡र्व꣢द्भिरस्तु꣣ त꣡रु꣢ता । वि꣡प्रे꣢भिरस्तु꣣ स꣡नि꣢ता ॥१४१७॥
स्वर सहित पद पाठसः । वा꣡ज꣢꣯म् । वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिः । वि꣢श्व꣢ । च꣣र्षणिः । अ꣡र्व꣢꣯द्भिः । अ꣡स्तु । त꣡रु꣢꣯ता । वि꣡प्रे꣢꣯भिः । वि । प्रे꣢भिः । अस्तु । स꣡नि꣢꣯ता ॥१४१७॥
स्वर रहित मन्त्र
स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता । विप्रेभिरस्तु सनिता ॥१४१७॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वाजम् । विश्वचर्षणिः । विश्व । चर्षणिः । अर्वद्भिः । अस्तु । तरुता । विप्रेभिः । वि । प्रेभिः । अस्तु । सनिता ॥१४१७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1417
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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विषय - संग्राम-विजय
पदार्थ -
(सः) = वह (विश्वचर्षणिः) = [चर्षणि=Seeing, observing] संसार को सूक्ष्मता से देखनेवाला प्रभुभक्त (अर्वद्भिः) = इन्द्रियरूप अश्वों के साथ निरन्तर चलनेवाले (वाजम्) = संग्राम को (तरुता अस्तु) = सफलता से पार करनेवाला हो । जीव का एक अध्यात्मसंग्राम निरन्तर चल रहा है । इन्द्रियाँ ग्रह हैं और विषय अतिग्रह । मनुष्य ने इन्हें जीतना है । ये अत्यन्त प्रबल हैं। मन को हर लेती हैं और मनुष्य हार जाता है, परन्तु यह प्रभुभक्त 'विश्वचर्षणि' है – विश्व को बारीकी से देखता हुआ उनमें फँसता नहीं, और इस प्रकार इन्द्रियों के साथ चल रहे संग्राम को जीत लेता है । इस संग्राम को जीतने के उद्देश्य से ही यह (विप्रेभिः) = अपना पूरण करनेवाले, न्यूनताओं को दूर करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणों के साथ (सनिता) = [Worship, honour] आपका सम्भजन करनेवाला अस्तु होता है । प्रभुभक्ति ने ही तो संग्राम में विजय प्राप्त करानी है ।
इस विजय को प्राप्त करके ही व्यक्ति बहिर्मुख न होकर अन्तर्मुख होता है—'आजीगर्ति' बनाता है और इस प्रकार सुख का निर्माण करनेवाला 'शुनः शेप' होता है ।
भावार्थ -
विषयों के स्वरूप को गहराई तक देखकर हम उनके प्रति आसक्ति से बचें।
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