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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1464
ऋषिः - शतं वैखानसाः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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अ꣢ग्न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि पवस꣣ आ꣢ सु꣣वो꣢र्ज꣣मि꣡षं꣢ च नः । आ꣣रे꣡ बा꣢धस्व दु꣣च्छु꣡ना꣢म् ॥१४६४॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣡ग्ने꣢꣯ । आ꣡यू꣢꣯ꣳषि । प꣣वसे । आ꣢ । सु꣣व । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । इ꣡ष꣢꣯म् । च꣣ । नः । आरे꣢ । बा꣣धस्व । दुच्छुना꣡म्꣢ ॥१४६४॥


स्वर रहित मन्त्र

अग्न आयूꣳषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥१४६४॥


स्वर रहित पद पाठ

अग्ने । आयूꣳषि । पवसे । आ । सुव । ऊर्जम् । इषम् । च । नः । आरे । बाधस्व । दुच्छुनाम् ॥१४६४॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1464
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

संख्या ६२७ पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है- (अग्ने) = हे बुराइयों को भस्म करनेवाले प्रभो ! (नः) = हमारे (आयूँषि) = जीवनों को (पवसे) = पवित्र कीजिए। आप (नः) = हमें (ऊर्जम्) = बल और प्राणशक्ति को तथा (इषम्) = प्रेरणा को-प्रकृष्टगति को (आसुव) = प्राप्त कराइए । आप (दुच्छुनाम्) = बुरी प्रवृत्ति को (आरे) = हमसे दूर (बाधस्व) पीड़ित कीजिए- रोक दीजिए । 

भावार्थ -

पवमान प्रभु के ध्यान से पवित्रता, बल व प्राणशक्ति तथा उत्तम प्रेरणा प्राप्त होती है और सब दुर्वृत्तियाँ दूर होती हैं ।

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