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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1563
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - अग्निः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम -
4
क्ष꣣पो꣡ रा꣢जन्नु꣣त꣢꣫ त्मनाग्ने꣣ व꣡स्तो꣢रु꣣तो꣡षसः꣢꣯ । स꣡ ति꣢ग्मजम्भ र꣣क्ष꣡सो꣢ दह꣣ प्र꣡ति꣢ ॥१५६३॥
स्वर सहित पद पाठक्ष꣢पः । रा꣣जन् । उत꣢ । त्म꣡ना꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । व꣡स्तोः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । उ꣣ष꣡सः꣢ । सः । ति꣢ग्मजम्भ । तिग्म । जम्भ । र꣡क्षसः꣢ । द꣣ह । प्र꣡ति꣢꣯ ॥१५६३॥
स्वर रहित मन्त्र
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः । स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति ॥१५६३॥
स्वर रहित पद पाठ
क्षपः । राजन् । उत । त्मना । अग्ने । वस्तोः । उत । उषसः । सः । तिग्मजम्भ । तिग्म । जम्भ । रक्षसः । दह । प्रति ॥१५६३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1563
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - असुर-विध्वंस की उपाय- -चतुष्टयी
पदार्थ -
हे (अग्ने) = अपने को आगे ले-चलनेवाले, (राजन्) = अत्यन्त नियमित जीवनवाले [Well regulated] जीव ! तू (उत) = निश्चय से (त्मना) = अपने मनोबल के द्वारा (क्षपः) = रात्रियों में (वस्तोः उत उषसः) = दिन के समय तथा उष:कालों में (रक्षसः) = राक्षसी वृत्तियों को (प्रतिदह) = एक-एक करके जला दे । राक्षसी व आसुरी वृत्तियों को समाप्त करने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं १. [अग्ने] मनुष्य आगे बढ़ने का प्रबल निश्चय करे । २. [ राजन्] जीवन को सूर्य व चन्द्रमा की भाँति नियमित गति से
ले-चले–सब कार्यों को समय पर करे तथा ३. मन को आत्मा के द्वारा जीतकर प्रबल बनाए । आत्मा के द्वारा जीता हुआ मन आत्मा का मित्र होता है और आसुरी वृत्तियों से मुक्ति का साधन बनता है।
आसुरी वृत्तियों को दूर करके प्रशस्तेन्द्रिय बननेवाले इस गोतम से प्रभु कहते हैं कि (सः) = वह तू (तिग्मजम्भ) = तीव्र मुखवाला है । तेरे मुख में सदा वेदवाणी होती है, जिसके द्वारा तू तेजस्वी होता है और अपनी प्रबल हुंकार से ही इन शत्रुओं को परे भगा देता है । एवं, कामादि शत्रुओं को दूर भगाने के लिए तेजस्वी मुखवाला होना भी आवश्यक है । तेजस्वी मुख उसी का होता है जिसके मुख में प्रभु का नाम है । यह प्रभु-नाम ही रक्षो- दहन की सर्वोत्तम औषध है ।
भावार्थ -
१. आगे बढ़ने की वृत्ति, २. नियमित जीवन, ३. मनोबल तथा ४. तीव्र व तेजस्वी मुख हमें असुरों को पराजित करने में सशक्त करे ।
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