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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1574
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
3
अ꣣स्ये꣡दिन्द्रो꣢꣯ वावृधे꣣ वृ꣢ष्ण्य꣣ꣳश꣢वो꣣ म꣡दे꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ वि꣡ष्ण꣢वि । अ꣣द्या꣡ तम꣢꣯स्य महि꣣मा꣡न꣢मा꣣य꣡वोऽनु꣢꣯ ष्टुवन्ति पू꣣र्व꣡था꣢ ॥१५७४॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣स्य꣡ । इत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वा꣣वृधे । वृ꣡ष्ण्य꣢꣯म् । श꣡वः꣢꣯ । म꣡दे꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । वि꣡ष्ण꣢꣯वि । अ꣡द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । तम् । अ꣣स्य । महिमा꣡न꣢म् । आ꣣य꣡वः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । स्तु꣣वन्ति । पूर्व꣡था꣢ ॥१५७४॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यꣳशवो मदे सुतस्य विष्णवि । अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा ॥१५७४॥
स्वर रहित पद पाठ
अस्य । इत् । इन्द्रः । वावृधे । वृष्ण्यम् । शवः । मदे । सुतस्य । विष्णवि । अद्य । अ । द्य । तम् । अस्य । महिमानम् । आयवः । अनु । स्तुवन्ति । पूर्वथा ॥१५७४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1574
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - सर्वोत्तम स्तुति
पदार्थ -
(इन्द्रः) = सोमपान करनेवाला जीव (वृष्ण्यं शव:) = सब सुखों के वर्षक बल को - अङ्ग-प्रत्यङ्ग को, शक्तिशाली बनानेवाले बल को, (अस्य सुतस्य) = इस शरीर में उत्पन्न सोम को, (विष्णवि) = सारे शरीर में या सारे जीवन में व्याप्त होनेवाले (मदे) = उल्लास के निमित्त (इत्) = ही (वावृधे) = खूब बढ़ाता है ।
जब इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनकर एक व्यक्ति अपने इन्द्र नाम को चरितार्थ करता है और जीवन के तीनों सवनों में, अर्थात् बाल्य, यौवन व वार्धक्य में सोम का पान करता है, अपनी वीर्यशक्ति की रक्षा करता है तब इसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग बड़ा दृढ़ बना रहता है और वह सुखी जीवनवाला होता है। अद्य-आज, अर्थात् सोमपान करनेवाले दिन ही (अस्य) = इस प्रभु की (तं महिमानम्) = उस प्रसिद्ध महिमा को, वीर्यादि अद्भुत वस्तुओं के निर्माण के माहात्म्य को, (आयवः) = क्रियाशील मनुष्य (पूर्वथा अनु स्तुवन्ति) = सर्वोत्तम प्रकार से [ In a first class manner] स्तुति करते हैं । प्रभु की महिमा के गायन का इससे उत्तम और क्या प्रकार हो सकता है कि हम उस प्रभु से दी गई सर्वोत्तम वस्तु को शरीर में सुरक्षित करके जीवन के अन्त तक सुदृढ़ शरीरवाले बने रहें । यही (पूर्वथा) = सर्वोत्तम प्रकार की स्तुति है ।
भावार्थ -
हम उस प्रभु के सर्वोत्तम स्तोता बनें ।
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