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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1683
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्रः छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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म꣣घो꣡नः꣢ स्म वृत्र꣣ह꣡त्ये꣢षु चोदय꣣ ये꣡ दद꣢꣯ति प्रि꣣या꣡ वसु꣢꣯ । त꣢व꣣ प्र꣡णी꣢ती हर्यश्व सू꣣रि꣢भि꣣र्वि꣡श्वा꣢ तरेम दुरि꣣ता꣢ ॥१६८३॥

स्वर सहित पद पाठ

म꣣घो꣡नः꣢ । स्म꣣ । वृत्रह꣡त्ये꣢षु । वृ꣣त्र । ह꣡त्ये꣢꣯षु । चो꣣दय । ये꣢ । द꣡द꣢꣯ति । प्रि꣣या꣢ । व꣡सु꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡णी꣢꣯ती । प्र । नी꣡ती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरि꣡भिः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । त꣣रेम । दुरिता꣢ । दुः꣣ । इता꣢ ॥१६८३॥


स्वर रहित मन्त्र

मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥१६८३॥


स्वर रहित पद पाठ

मघोनः । स्म । वृत्रहत्येषु । वृत्र । हत्येषु । चोदय । ये । ददति । प्रिया । वसु । तव । प्रणीती । प्र । नीती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरिभिः । विश्वा । तरेम । दुरिता । दुः । इता ॥१६८३॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1683
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 2; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

उत्तम निवासवाला अथवा वशियों में श्रेष्ठ 'वशिष्ठ' प्रार्थना करता है कि हे (हर्यश्व) = [ हृ, अश्] सर्वदुःखहारिन् ! सर्वव्यापक प्रभो! आप (मघोनः) = उन धनियों को (ये) = जो (प्रिया वसु) = प्रिय धनों का (ददति) = दान देते हैं, (वृत्रहत्येषु) = वासनाओं के विनाश में (चोदय स्म) = अवश्य ही प्रेरित कीजिए । वस्तुतः धन कोई हेय व घृणित वस्तु नहीं है। हाँ, धन में आसक्त हो जानेवालों को धर्मज्ञान नहीं रहता। धन में असक्त को ही तो धर्म का ध्यान रहता है। (अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते,) अतः मनुष्य को धन तो कमाना चाहिए, परन्तु उसमें आसक्ति से ऊपर उठने के लिए सदा दान देते रहना चाहिए, दान का अर्थ 'देना' तो है ही, 'दान' का अर्थ 'खण्डन' [दो अवखण्डने] भी है। यह दान सचमुच वृत्रादि वासनाओं का खण्डन करनेवाला है ।

धनों को पात्रों में दान देनेवाले सदा उत्तम सङ्ग प्राप्त करते हैं और उन (सूरिभिः) = विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके हम हे प्रभो ! (तव प्रणीती) = तेरे प्रणयन में – आपके बतलाये हुए वेदमार्ग पर चलने से (विश्वा) = सब (दुरिता) = पापों को (तरेम) = तैर जाएँ।

संक्षेप में अभिप्राय यह है कि दान देने की वृत्ति से १. विद्वानों का सम्पर्क प्राप्त होता है २. उनके उपदेशों के श्रवण से 'वेदज्ञान' मिलता है – प्रभु से प्रतिपादित वेदमार्ग का पता लगता है, और ३. उसपर चलकर हमारे सब दुरित दूर हो जाते हैं ४. अब हम सचमुच उत्तम निवासवाले 'वसिष्ठ' बनते हैं ।

भावार्थ -

हम दान दें और वासनाओं का विनाश करें। प्रभु-प्रतिपादित मार्ग पर चलकर दुरितों से दूर हों ।

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