Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1720
ऋषिः - विश्वामित्रो गाथिनः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
3
ग꣣म्भीरा꣡ꣳ उ꣢द꣣धी꣡ꣳरि꣢व꣣ क्र꣡तुं꣢ पुष्यसि꣣ गा꣡ इ꣢व । प्र꣡ सु꣢गो꣣पा꣡ यव꣢꣯सं धे꣣न꣡वो꣢ यथा ह्र꣣दं꣢ कु꣣ल्या꣡ इ꣢वाशत ॥१७२०॥
स्वर सहित पद पाठग꣣म्भीरा꣢न् । उ꣣दधी꣢न् । उ꣣द । धी꣢न् । इ꣣व । क्र꣡तु꣢꣯म् । पु꣣ष्यसि । गाः꣢ । इ꣣व । प्र꣢ । सु꣣गोपाः꣢ । सु꣣ । गोपाः꣢ । य꣡व꣢꣯सम् । धे꣣न꣡वः꣢ । य꣣था । ह्रद꣢म् । कु꣣ल्याः꣢ । इ꣣व । आशत ॥१७२०॥
स्वर रहित मन्त्र
गम्भीराꣳ उदधीꣳरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव । प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत ॥१७२०॥
स्वर रहित पद पाठ
गम्भीरान् । उदधीन् । उद । धीन् । इव । क्रतुम् । पुष्यसि । गाः । इव । प्र । सुगोपाः । सु । गोपाः । यवसम् । धेनवः । यथा । ह्रदम् । कुल्याः । इव । आशत ॥१७२०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1720
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - चार प्रयाण
पदार्थ -
१. जीव 'क्रतु' है । ('ओ३म् क्रतो स्मर') इस मन्त्रभाग में जीव को 'क्रतु' नाम से ही स्मरण किया गया है।‘यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति', इस उपनिषद्वाक्य के अनुसार क्रतु के अनुसार ही जीवन मिलने से जीव का नाम ही 'क्रतु' हो गया । हे प्रभो ! आप (क्रतुम्) = इस कर्मशील जीव को (गम्भीरान् उदधीन् इव) = गभीर समुद्रों की भाँति ज्ञान-जल से (पुष्यसि) = पुष्ट करते हो । समुद्र की भाँति अगाध ज्ञान ही तो जीव को ब्रह्मचर्याश्रम में प्राप्त करना है। यदि जीव 'क्रतु' व पुरुषार्थी बनता है तो प्रभु ऐसी परिस्थितियाँ प्राप्त कराते हैं जो ज्ञान-प्राप्ति के अनुकूल होती हैं और जीव का ज्ञान समुद्र की भाँति गम्भीर होता चलता है । अथर्ववेद में आचार्य को 'समुद्र' नाम दिया ही है ।
२. इस ज्ञान को प्राप्त कर मनुष्य गृहस्थ बनता है और (इव) = जैसे (सुगोपाः) = उत्तम ग्वाला (गाः) = गौवों का प्र=प्रकर्षेण पोषण करता है, इसी प्रकार यह गृहस्थ अपनी सन्तानों का पोषण करता है और इस कर्त्तव्यपालन के कारण प्रभु गृहस्थ का पोषण करता है।
३. अब (धेनवः) = गौवें यथा-जैसे (यवसम्) = चरी को प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार ये सद्गृहस्थ गृहस्थ को निभाकर, अपने सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करके, प्रभु को ही, जो [यु= मिश्रण व अमिश्रण] बुराई से पृथक् व भलाई से मिलानेवाले हैं, प्राप्त करता है । क्षुधित गौ को जैसे चरी ही रुचती है उसी प्रकार इस भक्त को प्रभु का नाम-स्मरण ही रुचिकर होता है । इसका परिणाम यह होता है कि यह सदा उस प्रभु का स्मरण करता हुआ - सदा तद्भाव से भावित होने के कारण अन्त समय में भी प्रभु का ही स्मरण करता है, और
४. (इव) = जैसे (कुल्याः) = नालियाँ (ह्रदम्) = एक तालाब में (आशत) = व्याप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार यह भक्त अन्त में प्रभु से मेल करता है ।
भावार्थ -
मैं अपने को ज्ञान का समुद्र बनाऊँ, अपनी सन्तानों का उत्तम पालन करूँ, प्रभु के नाम को ही अपना भोजन बनाऊँ, और अन्त में प्रभु से मेल करूँ ।
इस भाष्य को एडिट करें