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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1733
यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि वा꣢꣯जिनीव꣣त्य꣡श्वा꣢ꣳ अ꣣द्या꣢रु꣣णा꣡ꣳ उ꣢षः । अ꣡था꣢ नो꣣ वि꣢श्वा꣣ सौ꣡भ꣢गा꣣न्या꣡ व꣢ह ॥१७३३॥
स्वर सहित पद पाठयुङ्क्ष्व । हि । वा꣣जिनीवति । अ꣡श्वा꣢꣯न् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । अ꣣रुणा꣢न् । उ꣣षः । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । सौ꣡भ꣢꣯गानि । सौ । भ꣣गानि । आ꣢ । व꣣ह ॥१७३३॥
स्वर रहित मन्त्र
युङ्क्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाꣳ अद्यारुणाꣳ उषः । अथा नो विश्वा सौभगान्या वह ॥१७३३॥
स्वर रहित पद पाठ
युङ्क्ष्व । हि । वाजिनीवति । अश्वान् । अद्य । अ । द्य । अरुणान् । उषः । अथ । नः । विश्वा । सौभगानि । सौ । भगानि । आ । वह ॥१७३३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1733
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - आरोचन अश्व
पदार्थ -
(वाजिनीवति) = उत्तम अन्नों के द्वारा शक्ति देनेवाली हे (उष:) = उषे! तू (अद्य) = आज (हि) = निश्चय से (अरुणान् अश्वान्) = आरोचन अश्वों को, अर्थात् तेजस्विता से चमकते हुए इन्द्रियरूपी घोड़ों को (युङ्ङ्क्ष्व) = हमारे इस शरीररूप रथ में जोत । वे इन्द्रियरूप घोड़े तेजस्वी हों, अरुण-आरोचन हों। रुग्ण होकर हमारे इस जीवन-रथ को ये बीच में ही खड़ा न कर दें ।
(अथ) = इस प्रकार अब (न:) = हमें (विश्वा सौभगानि) = सब सौभाग्यों को (आवह) = तू प्राप्त करा । वस्तुत: इस शरीररूप रथ में इन घोड़ों के ठीक होने पर ही सब सौन्दर्य उत्पन्न होता है । ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान में वृद्धि होती है तो कर्मेन्द्रियों से शक्ति में । ज्ञान और शक्ति ही मिलकर हमें श्रीसम्पन्न करते हैं। किसी भी रथ में शक्ति एंजिन का प्रतीक है तो ज्ञान प्रकाश का ।
भावार्थ -
मेरा शरीररूप रथ सशक्त व सप्रकाश हो ।
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