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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1761
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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प्र꣢ ते꣣ धा꣡रा꣢ अस꣣श्च꣡तो꣢ दि꣣वो꣡ न य꣢꣯न्ति वृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣢च्छा꣣ वा꣡ज꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥१७६१॥

स्वर सहित पद पाठ

प्र꣢ । ते꣣ । धा꣡राः꣢꣯ । अ꣣सश्च꣡तः꣢ । अ꣣ । सश्च꣡तः꣢ । दि꣣वः꣢ । न । य꣣न्ति । वृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡च्छ꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । स꣣हस्रि꣡ण꣢म् ॥१७६१॥


स्वर रहित मन्त्र

प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः । अच्छा वाजꣳ सहस्रिणम् ॥१७६१॥


स्वर रहित पद पाठ

प्र । ते । धाराः । असश्चतः । अ । सश्चतः । दिवः । न । यन्ति । वृष्टयः । अच्छ । वाजम् । सहस्रिणम् ॥१७६१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1761
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

शरीर में सोम–वीर्य वह धातु है जो धातुओं की भी धातु है । वास्तव में यही शरीर का मूल धारक है। जब तक यह शरीर में सुरक्षित होता है तब तक यह असश्चत्=अपराभूत [not defeated] होने से शरीर में किसी रोगादि का प्रवेश नहीं होने देता । शरीर को यह अत्यन्त सबल बनाता है । जैसे आकाश से वृष्टियाँ गिरती हैं और एक-एक दाने को शतगुणित दाने उत्पन्न करने योग्य बनाती हैं उसी प्रकार यह सोम मनुष्य को खूब सशक्त बनाकर उसे शतश: ज्ञानों का प्राप्त करनेवाला बनाते हैं ।

प्रस्तुत मन्त्र ‘अवत् सार' ऋषि के हैं जो इस सारभूत वस्तु की ध्यान से रक्षा करता है । वह अनुभव करता हुआ कहता है कि – हे सोम ! (ते) = तेरी, जो तू (असश्चतः) = अपराभूत है—इस देवों की निवासस्थानभूत नगरी का ऐसा द्वारपाल है कि किसी भी रोगादि को व आसुर भावना को अन्दर नहीं आने देता—उस तेरी (धारा:) = धारण-शक्तियाँ (दिवः वृष्टयः न) = द्युलोक से वर्षा की भाँति (सहस्त्रिणं वाजं अच्छ) = सहस्रगुणा शक्ति की ओर (यन्ति) = गति करती हैं, अर्थात् मनुष्य को यह सोम अनन्तशक्ति-सम्पन्न बनाता है । कल्पना भी करनी कठिन होती है कि इतनी शक्ति कहाँ से आ टपकी ? मन्त्र कहता है कि 'अरे जैसे वर्षा टपकती है उसी प्रकार यह शक्ति भी आ टपकती है'। यह सोमरक्षा का महत्त्व है। इसे ध्यान करके ही 'अवत्सार' ने इसे अपना मूलकर्त्तव्य समझा । इसे ही वैदिक साहित्य में 'ब्रह्मचर्यं परं तपः' व 'ब्रह्मचर्यं परो धर्मः' शब्दों में परं-तप व परं-धर्म कहा गया है।

भावार्थ -

भावार्थ—मैं सोमरक्षा द्वारा अजेय बनूँ तथा सहस्रगुणा शक्ति का लाभ करूँ ।
 

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