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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1762
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
अ꣣भि꣢ प्रि꣣या꣢णि꣣ का꣢व्या꣣ वि꣢श्वा꣣ च꣡क्षा꣢णो अर्षति । ह꣡रि꣢स्तुञ्जा꣣न꣡ आयु꣢꣯धा ॥१७६२॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣भि꣢ । प्रि꣣या꣡णि꣢ । का꣡व्या꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯ । च꣡क्षा꣢꣯णः । अ꣣र्षति । ह꣡रिः꣢꣯ । तु꣣ञ्जानः꣢ । आ꣡यु꣢꣯धा ॥१७६२॥
स्वर रहित मन्त्र
अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति । हरिस्तुञ्जान आयुधा ॥१७६२॥
स्वर रहित पद पाठ
अभि । प्रियाणि । काव्या । विश्वा । चक्षाणः । अर्षति । हरिः । तुञ्जानः । आयुधा ॥१७६२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1762
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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विषय - सर्वदुःख-हरणशील सोम
पदार्थ -
शरीर को सब रोगों से सुरक्षित करने से यह सोम 'हरि' है- सब दुःखों का हरण करनेवाला है। यह जीव को दिये गये 'इन्द्रिय, मन व बुद्धि' रूप सब आयुधों को सुरक्षित करता है। इस जीवन-संग्राम में विजय के लिए प्रभु ने ये तीन ही तो आयुध-अस्त्र जीव को दिये हैं। सोम इन तीनों आयुधों को सशक्त बनाता है - इन्द्रियों की शक्ति को तो यह बढ़ाता ही है - मन के नैर्मल्य व बुद्धि की तीव्रता का भी यह साधन है। बुद्धि को तीव्र बनाकर यह मनुष्य को इस योग्य बनाता है कि प्रभु के इन वेदमन्त्ररूप काव्यों को यह अच्छी प्रकार देख पाता है— उन्हें समझने की योग्यतावाला होता है। मन्त्र में कहते हैं
(हरि:) = सब दु:खों, रोगों व मलों को हरनेवाला यह सोम (विश्वा आयुधा) = सब आयुधों कोइन्द्रियों, मन व बुद्धि को (तुञ्जा नः) = [तुञ्ज to guard] सुरक्षित करता हुआ और इस प्रकार (प्रियाणि) = हित के साधक (काव्या) = मन्त्ररूप काव्यों का (अभिचक्षाण:) = प्रकृति व आत्मा दोनों के दृष्टिकोण से देखता हुआ (अर्षति) = शरीर में गति करता है और अभि अर्षति उस प्रभु की ओर चलता है ।
इस सोमरक्षा का यह परिणाम होता है कि १. रोग नहीं घेरते [हरिः], २. इन्द्रियाँ सशक्त, मन निर्मल व बुद्धि तीव्र रहती है [तुञ्जाना आयुधा], ३. वेद मन्त्रों का ठीक अर्थ दृष्टिगोचर होता है, तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है [काव्या चक्षाण:] और ४. जीव प्रभु की ओर गतिशील होता है [अभि अर्षति] ।
भावार्थ -
मैं सोम के हरित्व – सर्वदुःखहरणशीलता को समझँ और दुःखों से ऊपर उहूँ ।
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