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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1767
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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सु꣣ष꣡हा꣢ सोम꣣ ता꣡नि꣢ ते पुना꣣ना꣡य꣢ प्रभूवसो । व꣡र्धा꣢ समु꣣द्र꣡मु꣢क्थ्य ॥१७६७॥

स्वर सहित पद पाठ

सु꣣ष꣡हा꣢ । सु꣣ । स꣡हा꣢꣯ । सो꣣म । ता꣡नि꣢꣯ । ते꣣ । पुनाना꣡य꣢ । प्र꣣भूवसो । प्रभु । वसो । व꣡र्ध꣢꣯ । स꣣मु꣢द्रम् । स꣣म् । उ꣢द्रम् । उ꣣क्थ्य ॥१७६७॥


स्वर रहित मन्त्र

सुषहा सोम तानि ते पुनानाय प्रभूवसो । वर्धा समुद्रमुक्थ्य ॥१७६७॥


स्वर रहित पद पाठ

सुषहा । सु । सहा । सोम । तानि । ते । पुनानाय । प्रभूवसो । प्रभु । वसो । वर्ध । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । उक्थ्य ॥१७६७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1767
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

प्रस्तुत मन्त्र में सोम को 'प्रभूवसो' कहा है कि यह ‘प्रभावजनक वसु' वाला है— सब रोगों को आधि-व्याधियों को समाप्त करके यह मनुष्य का शरीर में उत्तम वास करनेवाला है। यह ‘उक्थ्य' है—मनुष्य को प्रभु स्तवन में उत्तम बनाता है। इस सोम से कहते हैं कि (पुनानाय ते) = पवित्र करनेवाले तेरे लिए (तानि) = वे सब मानव जीवन की प्रगति में आनेवाले (विघ्न सुषहा) = सुगमता से सहने योग्य हैं। चाहे शरीर के रोग हैं— चाहे मानस रोग हैं— सोम उन सभी को समाप्त कर देता है और हमें जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के योग्य बनाता है ।

यह सोम हमारे जीवन में (समुद्रम्) = सदा आनन्द से पूर्ण प्रभु को (वर्द्धा) = बढ़ाता है, अर्थात् सब प्रकार से नीरोग होकर यह मनुष्य भी (प्रसन्न) =cheerful मनोवृत्ति का बनता है और इस प्रकार उस समुद्र – आनन्द के सागर प्रभु के आनन्दकणों की अपने अन्दर अभिवृद्धि कर रहा होता है। जीवन में आनन्द की वृद्धि का कार्यक्रम स्पष्ट है कि मनुष्य १. सोमरक्षा के द्वारा, २. रोग बीजों को नष्ट कर स्वस्थ बनें, ३. मानस पवित्रता का सम्पादन करके अपने निवास को उत्तम बनाये, ४. प्रभु के स्तवन की वृत्तिवीला हो और ५. अपने जीवन में आनन्द की अभिवृद्धि करे ।

भावार्थ -

सोम मेरे आनन्द को उसी प्रकार बढ़ानेवाला हो जैसे सोम [चन्द्र] से समुद्र में ज्वार आ जाता है ।

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