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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1780
ऋषिः - प्रस्कण्वः काण्वः
देवता - अग्निः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
3
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥१७८०॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡ग्ने꣢꣯ । वि꣡व꣢꣯स्वत् । वि । व꣣स्वत् । उष꣡सः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । रा꣡धः꣢꣯ । अ꣣मर्त्य । अ । मर्त्य । आ꣢ । दा꣣शु꣡षे । जा꣣तवेदः । जात । वेदः । वह । त्व꣢म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । दे꣣वा꣢न् । उ꣣ष꣡र्बु꣢धः । उ꣣षः । बु꣡धः꣢꣯ ॥१७८०॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रꣳ राधो अमर्त्य । आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाꣳ उषर्बुधः ॥१७८०॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्ने । विवस्वत् । वि । वस्वत् । उषसः । चित्रम् । राधः । अमर्त्य । अ । मर्त्य । आ । दाशुषे । जातवेदः । जात । वेदः । वह । त्वम् । अद्य । अ । द्य । देवान् । उषर्बुधः । उषः । बुधः ॥१७८०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1780
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - अग्नि, अमर्त्य व जातवेद'
पदार्थ -
प्रस्तुत मन्त्र में प्रस्कण्व प्रभु को 'अग्ने, अमर्त्य तथा जातवेदाः ' शब्दों से सम्बोधित करता है । वे प्रभु (अग्निः) = सब प्रकार की अग्रगति के साधक हैं— (अमर्त्य) = किसी भी चीज के पीछे मरनेवाले नहीं हैं, अर्थात् कहीं भी आसक्त नहीं हैं, क्योंकि (जातवेदः) = व प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ के तत्त्व को जानते हैं। इस प्रकार प्रभु का स्मरण करता हुआ प्रस्कण्व यह समझता है कि उसके जीवन का लक्ष्य भी निरन्तर उन्नति करना है, उस उन्नति के लिए आवश्यक है कि वह किसी भी वस्तु के पीछे अत्यन्त आसक्त न हो जाए और इस आसक्ति से बचने के लिए वह अपने ज्ञान को निरन्तर बढ़ाने में लगा रहे, इसीलिए वह प्रार्थना करता है कि आप (उषसः) = अज्ञानान्धकार के (विवस्वत्) = निवर्तक (चित्रं राधः) = [चित्=ज्ञान] ज्ञान प्राप्त करानेवाले बुद्धिरूप धन को (दाशुषे) = मुझ आत्मसमर्पण करनेवाले के लिए (आवह) = प्राप्त कराइए । इस ज्ञान-धन को प्राप्त कराने के लिए ही (त्वम्) = आप (अद्य) = आज ही (उषर्बुधः) = प्रातः काल जागरणशील अथवा आज्ञानान्धकार से जागरित हो चुके (देवान्) = प्रकाशमय और प्रकाश को प्राप्त करानेवाले देवों को आवह प्राप्त कराइए । इन देवों के सम्पर्क में आकर ही तो मैं ज्ञान प्राप्त कर पाऊँगा, ज्ञान प्राप्त करने पर ही मेरी आसक्ति समाप्त होगी और मैं उन्नति-पथ
पर आगे बढ़नेवाला बनूँगा । प्रभु अपने भक्तों की रक्षा इसी प्रकार तो करते हैं कि वे उन्हें देवों का सङ्ग प्राप्त कराते हैं। विद्वानों के सम्पर्क के द्वारा वे उन्हें वह बुद्धि प्राप्त कराते हैं जो उन्हें ज्ञानधन देकर 'प्रस्कण्व'= मेधावी बनाती है | हमारा तो यही कर्त्तव्य है कि 'हमें अग्नि बनना है, अमर्त्य बनना है और जातवेद बनना है', अपने इस लक्ष्य-त्रय का स्मरण करते हुए हम अपने कर्त्तव्य कर्म में लगे रहें और परमेश्वरार्पण की भावना से जीवन यापन करें ।
भावार्थ -
हमारा जप हो कि हम भी प्रभु की भाँति 'अग्नि, अमर्त्य, व जातवेद' बनेंगे।
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