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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1790
ऋषिः - सुकक्ष आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣तं꣢ या꣣हि꣡ म꣢दानां पते । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९०॥

स्वर सहित पद पाठ

उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् । या꣣हि꣢ । म꣣दानाम् । पते । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१७९०॥


स्वर रहित मन्त्र

उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते । उप नो हरिभिः सुतम् ॥१७९०॥


स्वर रहित पद पाठ

उप । नः । हरिभिः । सुतम् । याहि । मदानाम् । पते । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१७९०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1790
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

संसार में नाना प्रकार के मद-हर्ष हैं। उन सब मदों व हर्षों को प्राप्त करानेवाले वे प्रभु ही हैं । इस प्रभु की शरण में जानेवाला व्यक्ति 'सुकक्ष' है— उत्तम शरणवाला है । यह सुकक्ष प्रभु से आराधना करता है—मदानां पते - आनन्द के स्वामिन् प्रभो ! आप (हरिभिः) = इन्द्रियों के उद्देश्य से (न:) = हमें (सुतम्) =  सोमशक्ति को (उपयाहि) = प्राप्त कराइए । इन्द्रियों की शक्ति का रहस्य सोम की रक्षा में है। यह सोम हमारी इन्द्रियों को सबल बनानेवाला है। इसके अपव्यय से इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती हैं । दुर्बल इन्द्रियाँ दुर्गति व नरक का कारण बनती हैं। सारे रोग इसी के अभाव में उत्पन्न होते हैं और मनुष्य का जीवन कष्टमय हो जाता है ।

‘ये सशक्त बनी हुई इन्द्रियाँ यज्ञों में प्रवृत्त रहें' इसके लिए यह सुकक्ष प्रभु से आराधना करता है कि हे प्रभो! आप (नः) = हमें (हरिभिः) = इन इन्द्रियों से (सुतम्) = यज्ञ को (उप) = प्राप्त कराइए, अर्थात् हमारी सशक्त बनी हुई इन्द्रियाँ सदा यज्ञों में प्रवृत्त रहें ।

भावार्थ -

मनुष्य के दो ही महान् कर्त्तव्य हैं – १. इन्द्रियों को सशक्त बनाना, २. सशक्त इन्द्रियों को यज्ञों में प्रवृत्त रखना । ये ही दो बातें सब आनन्दों का मूल हैं ।

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