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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1809
ऋषिः - नीपातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
4
आ꣢ त्वा꣣ ग्रा꣢वा꣣ व꣡द꣢न्नि꣣ह꣢ सो꣣मी꣡ घोषे꣢꣯ण वक्षतु । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०९॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢ । त्वा꣣ । ग्रा꣡वा꣢꣯ । व꣡द꣢꣯न् । इ꣣ह꣢ । सो꣣मी꣢ । घो꣡षे꣢꣯ण । व꣣क्षतु । दि꣣वः꣢ । अ꣣मु꣡ष्य꣢ । शा꣡स꣢꣯तः । दि꣡व꣢꣯म् । य꣣य꣢ । दि꣣वावसो । दिवा । वसो ॥१८०९॥
स्वर रहित मन्त्र
आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण वक्षतु । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥१८०९॥
स्वर रहित पद पाठ
आ । त्वा । ग्रावा । वदन् । इह । सोमी । घोषेण । वक्षतु । दिवः । अमुष्य । शासतः । दिवम् । यय । दिवावसो । दिवा । वसो ॥१८०९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1809
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - संयमी विद्वान् का उपदेश
पदार्थ -
प्रभु कहते हैं कि हे नीपातिथे ! [तत्त्वज्ञान की प्राप्ति की इच्छावाले जीव !] (त्वा) = तुझे (सोमी) = सोमशक्ति का [वीर्य-शक्ति का] अपने में संयम करनेवाला (ग्रावा) = विद्वान् [विद्वांसो हि ग्रावाण: श० ३.९.३.१४] (आवदन्) = ज्ञान-विज्ञान का उपदेश देता हुआ (घोषेण) = वेदमन्त्रों के उच्चारण से (इह) = इस प्रकाशमय लोक में (वक्षतु) = प्राप्त कराए । = आचार्य को विद्वान् तो होना ही चाहिए, विद्वत्ता के साथ उसका ब्रह्मचारी संयमी जीवनवाला होना भी आवश्यक है । वह व्यापक ज्ञान को प्राप्त करानेवाला हो [आ] । वेदमन्त्रों के उच्चारण से आचार्य विद्यार्थी को ज्ञान देता है और उसे प्रकाशमय लोक में प्राप्त कराता है । = जीव का यही मौलिक कर्त्तव्य है कि वह 'दिवावसु' - ज्ञान धनवाला बने और उस प्रकाशमय ब्रह्माण्ड के शासक प्रभु के प्रकाशमय लोक को प्राप्त करे।
भावार्थ -
हम संयमी विद्वान् के शिष्य बनें ।