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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 184
ऋषिः - उलो वातायनः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४॥

स्वर सहित पद पाठ

वा꣡तः꣢꣯ । आ । वा꣢तु । भेषज꣢म् । शं꣣म्भु꣢ । श꣣म् । भु꣢ । म꣣योभु꣢ । म꣣यः । भु꣢ । नः꣣ । हृदे꣢ । प्र । नः꣣ । आ꣡यूँ꣢꣯षि । ता꣣रिषत् ॥१८४॥


स्वर रहित मन्त्र

वात आ वातु भेषजꣳ शम्भु मयोभु नो हृदे । प्र न आयूꣳषि तारिषत् ॥१८४॥


स्वर रहित पद पाठ

वातः । आ । वातु । भेषजम् । शंम्भु । शम् । भु । मयोभु । मयः । भु । नः । हृदे । प्र । नः । आयूँषि । तारिषत् ॥१८४॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 184
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 10
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 7;
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पदार्थ -

गत मन्त्र में ज्ञानरूप नौका से भवसागर को तैरने का उल्लेख है, परन्तु इस ज्ञान की ओर कोई विरल धीर ही प्रवृत्त होता है। इसका कारण क्या है? गर्भावस्था में तो यह जीव निश्चय कर रहा था कि 'इस बार गर्भ से निकलकर प्रभु का स्मरण करूँगा, प्रलोभनों में नहीं फसूँगा', परन्तु बाहर आते ही, संसार की हवा लगते ही उसके सारे संकल्प समाप्त हो जाते हैं, वह उन सबको भूल जाता है। बड़ा होने पर भी उसे जैसा वातावरण [atmosphere] प्राप्त होता है, वैसा ही उसका जीवन बन जाता है, अतः प्रभु से इस मन्त्र का ऋषि प्रार्थना करता है कि हे प्रभो! आप ऐसी कृपा करो कि (वातः आवातु) = हमारे लिए तो ऐसी हवा बहे जो (भेषजम्)=सब अहितों के लिए औषध-तुल्य हो । औषध जैसे रोग को समाप्त करती है, इसी प्रकार वह बुराइयों को दूर करनेवाली हो । (शम्भु मयोभु नो हृदे) = वह हवा हमें मानस शान्ति और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करानेवाली हो । परिस्थितिवश ही मनुष्य अशान्त चित्तवृत्तिवाला तथा अस्वस्थ भी बन जाया करता है। क्लबवालों के सङ्ग में पड़कर वह स्वस्थ व शान्तचित्त थोड़े ही बनेगा! अच्छी सङ्गति मिल गई तो वह पापों में भी न फँसेगा, शान्त भी होगा और स्वस्थ भी। इन सब बातों के द्वारा वे प्रभु (नः आयूंषि) = हमारे जीवनों को प्रतारिषत् =सब व्यसनों से पार कर देते हैं। प्रलोभनों को जीतकर हम अपने जीवनों को बड़ा सुन्दर बना लेते हैं।

ये सब बातें होती तभी हैं, जब हम 'वातायन'=[वातेन अयते] वातावरण के अनुसार ही चलनेवाले उल: = [उल= to go ] उसी वातावरण में क्रिया करनेवाले बनने का प्रयत्न करता है।

भावार्थ -

प्रभुकृपा से हमें उत्तम परिस्थिति प्राप्त हो और हम गतिशील बनें।
 

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