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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 185
ऋषिः - कण्वो घौरः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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य꣡ꣳ रक्ष꣢꣯न्ति꣣ प्र꣡चे꣢तसो꣣ व꣡रु꣢णो मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । न꣢ किः꣣ स꣡ द꣢भ्यते꣣ ज꣡नः꣢ ॥१८५॥

स्वर सहित पद पाठ

य꣢म् । र꣡क्ष꣢꣯न्ति । प्र꣡चे꣢꣯तसः । प्र । चे꣣तसः । व꣡रु꣢꣯णः । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣣र्यमा꣢ । न । किः꣣ । सः꣢ । द꣣भ्यते । ज꣡नः꣢꣯ ॥१८५॥


स्वर रहित मन्त्र

यꣳ रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा । न किः स दभ्यते जनः ॥१८५॥


स्वर रहित पद पाठ

यम् । रक्षन्ति । प्रचेतसः । प्र । चेतसः । वरुणः । मित्रः । मि । त्रः । अर्यमा । न । किः । सः । दभ्यते । जनः ॥१८५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 185
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 8;
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पदार्थ -

(सः जनः) = वह विकासशील मनुष्य (न कि:) = नहीं (दभ्यते) = हिंसित होता (यम्) = जिसकी प्(रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले (वरुणोः मित्रोः अर्यमा) = वरुण, मित्र और अर्यमा (रक्षन्ति) = रक्षा करते हैं।

‘जनः’ शब्द मनुष्य के लिए उस समय प्रयुक्त होता है, जब [जनी प्रादुर्भावे] प्रादुर्भाव व विकास का संकेत करना हो । जो मनुष्य अपना विकास करता है वह कण-कण करके अपने अन्दर उत्तमता का संग्रह करता है, अतः वह कण्व कहलाता है। यह कण्व ही मेधावी है, क्योंकि यह धैर्य और अध्यवसायपूर्वक अपने जीवन को उत्तम बनाने में लगा है। यह अपने अन्दर जिन भावनाओं को मूर्तरूप देने का प्रयत्न करता है, उनका संकेत निम्न शब्दों से हो रहा है

१. (वरुणः)=‘वरुणो नाम वरः श्रेष्ठ : ' = वरुण अर्थात् श्रेष्ठ । श्रेष्ठ वह है जो अपने आन्तर शत्रुओं को जीतकर अपने जीवन को निर्मल बनाता है। बाह्य शत्रुओं के विजय की अपेक्षा इन आन्तर शत्रुओं को जीतना कहीं अधिक महत्त्व रखता है। इन्हें जीतकर हम त्रिभुवन को जीत लेते हैं।

२. (मित्र:)=यह [प्रमीतेः त्रायते] मृत्यु व पाप से अपने को बचाता है। अथवा [मिद्-स्नेह करना] प्राणिमात्र के प्रति स्नेह की भावना को अपने अन्दर उपजाता है। श्रेष्ठ बनने के लिए द्वेष से दूर होना नितान्त आवश्यक है। यह यथासम्भव औरों को भी मृत्यु व पाप से बचाने के लिए यत्नशील होता है।

३. (अर्यमा)='अर्यमेति तमाहुः यो ददाति' इस ब्राह्मणवाक्य के अनुसार अर्यमा का अर्थ है दाता। यह देने की भावना को अपने अन्दर उपजाता है। वस्तुत: दान [ दा = देना] ही मानव जीवन को शुद्ध [दा- शोधने] बनाता है तथा उसके बन्धनों को काटता है [दा- काटना]। ४. उपर्युक्त तीनों शब्दों का विशेषण मन्त्र में ‘प्रचेतसः'='प्रकृष्ट ज्ञानी' दिया गया है। उन सब बातों के साथ 'उत्कृष्ट ज्ञान' होना भी आवश्यक है। वस्तुतः उत्कृष्ट ज्ञान के बिना उनका होना सम्भव भी नहीं ।

इन सब बातो को जब कण्व अपने जीवन में लाता है तब वह कभी हिंसित नहीं होता, उल्लिखित दिव्य गुण उसकी रक्षा कर रहे होते हैं। वह कण्व धोर बन जाता है।

भावार्थ -

हम अपने जीवनों को ज्ञान, जितेन्द्रियता, निर्देषता व दानशीलता से अलंकृत करने के लिए प्रयत्नशील हों ।

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