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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 187
ऋषिः - वत्सः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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इ꣣मा꣡स्त꣢ इन्द्र꣣ पृ꣡श्न꣢यो घृ꣣तं꣡ दु꣢हत आ꣣शि꣡र꣢म् । ए꣣ना꣢मृ꣣त꣡स्य पि꣣प्यु꣡षीः꣢ ॥१८७॥
स्वर सहित पद पाठइ꣣माः꣢ । ते꣣ । इन्द्र । पृ꣡श्न꣢꣯यः । घृ꣣त꣢म् । दु꣣हते । आशि꣡र꣢म् । आ꣣ । शिर꣢꣯म् । ए꣣ना꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पि꣣प्यु꣡षीः꣢ ॥१८७॥
स्वर रहित मन्त्र
इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम् । एनामृतस्य पिप्युषीः ॥१८७॥
स्वर रहित पद पाठ
इमाः । ते । इन्द्र । पृश्नयः । घृतम् । दुहते । आशिरम् । आ । शिरम् । एनाम् । ऋतस्य । पिप्युषीः ॥१८७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 187
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 8;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 8;
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विषय - स्वाध्याय का लाभ
पदार्थ -
पिछले मन्त्र में प्रभु ने वत्स से कहा था कि तू मेरी उपासना ज्ञानसम्पादन द्वारा ही करेगा। अब वत्स प्रभु से कहता है- हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (इमा)=ये (ते) = तेरी (पृश्नयः) =प्रकाश को स्पर्श करनेवाली वेदवाणियाँ (आशिरम्) = [आ+शृ] सब प्रकार के मलों को नष्ट करनेवाली (घृतम्) = दीप्ति को (दुहते) = हममें खूब भरती हैं तथा ये वेदवाणियाँ (एनाम्) = इस गृहपत्नी को (ऋतस्य)=नियमितता के द्वारा (पिप्युषी:) = [प्याय्-वृद्धौ] वृद्धिशील बनाती हैं।
4 इस मन्त्र में वेदवाणियों को ‘पृश्नि' कहा है। एक-एक वेदमन्त्र प्रकाश से परिपूर्ण है। अधिक-से-अधिक संक्षिप्त और अधिक-से-अधिक अर्थ से परिपूर्ण | इतना अर्थगौरव संसार के सारे साहित्य में कहीं भी उपलभ्य नहीं है। ये वेदवाणियाँ वत्स को-इनके व्यक्त उच्चारण करनेवाले को ‘घृतम्' [घृ दीप्तौ] उस ज्ञान की दीप्ति से भर देती हैं, जो 'आशिर' है-सब मलों को दूर कर देनेवाला है। स्वाध्याय ही हमारे ज्ञान को बढ़ाता हुआ हमारे मलों को क्षीण करता चलता है। ज्ञान-मलों को भस्म करनेवाली अग्नि ही तो है। यह पवित्र करने का सर्वोत्तम साधन है। स्वाध्याय का दूसरा लाभ यह है कि इससे मनुष्य के जीवन में नियमितता [ऋत] आ जाती है। वह प्रत्येक कार्य को यथासमय व यथास्थान पर करता है। यहाँ इस लाभ का वर्णन करते हए ‘एनाम्' इस स्त्रीलिङ्गी शब्द का प्रयोग हुआ है। वस्तुतः घर में गृहपत्नी की नियमितता सभी को नियमित बनानेवाली होती है। जिस घर में नियमितता होगी वह फूले- फलेगा इसमें तो सन्देह ही नहीं है ।
भावार्थ -
हम स्वाध्याय से निर्मल दीप्ति प्राप्त करके नियमित जीवनवाले बनें।
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