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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 33
ऋषिः - सिन्धुद्वीप आम्बरीषः, त्रित आप्त्यो वा
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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शं꣡ नो꣢ दे꣣वी꣢र꣣भि꣡ष्ट꣢ये꣣ शं꣡ नो꣢ भवन्तु पी꣣त꣡ये꣢ । शं꣢꣫ योर꣣भि꣡ स्र꣢वन्तु नः ॥३३॥
स्वर सहित पद पाठश꣢म् । नः꣢ । देवीः꣢ । अ꣣भि꣡ष्ट꣢ये । शम् । नः꣣ । भवन्तु । पीत꣡ये꣢ । शम् । योः । अ꣣भि꣢ । स्र꣣वन्तु । नः ॥३३॥
स्वर रहित मन्त्र
शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये । शं योरभि स्रवन्तु नः ॥३३॥
स्वर रहित पद पाठ
शम् । नः । देवीः । अभिष्टये । शम् । नः । भवन्तु । पीतये । शम् । योः । अभि । स्रवन्तु । नः ॥३३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 33
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 13
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 13
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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विषय - दिव्य बुद्धियाँ [Libraries]
पदार्थ -
१. (देवी:) = दिव्य बुद्धियाँ, (नः शम्) = हमारे लिए शान्ति देनेवाली हों । ज्ञान ही मनुष्य को वास्तविक शान्ति प्राप्त करा सकता है। ज्ञान की पराकाष्ठा में वह शान्ति है, जो मनुष्य को वस्तुतः सुखी करती है।
२. (अभिष्टये) = ये दिव्य बुद्धियाँ ही आक्रमण के लिए होती हैं। हमपर जो भी आसुर भावनाएँ आक्रमण करती हैं, ज्ञान ही प्रत्याक्रमण द्वारा उनसे हमारी रक्षा करता है।
३. इस प्रकार (नः) = हमारे रोगों को (शम् )= शान्त करते हुए जल (पीतये) = रक्षा के लिए (भवन्तु) = हों । ज्ञान का अभाव विनाश का मार्ग है। ज्ञान ही वह कवच है जो मानव की आधि-व्याधियों से रक्षा करता है।
४. (शं-योः )= ये शान्ति देनेवाली तथा सब भय व रोगों का निवारण करनेवाली दिव्य बुद्धियाँ (नः) = हमारे (अभिस्त्रवन्तु) = चारों ओर बहें अर्थात् हम सदा ज्ञान के वातावरण में रहें। हमारे चारों ओर ऋषि-महर्षि अपने ग्रन्थों के रूप में उपस्थित हों और उनके सङ्ग रहकर हम सदा अपने ज्ञान को बढ़ाते हुए शान्ति, शक्ति, रक्षा तथा नीरोगता आदि का अनुभव करें। ज्ञान के द्वारा तीनों प्रकार के कष्टों से उत्तीर्ण होकर हम इस मन्त्र के ऋषि ‘त्रित' बनें।
भावार्थ -
ज्ञान के समान पवित्र करनेवाली कोई वस्तु नहीं है। हम ज्ञान - समुद्र में डुबकी लगाने का अभ्यास करें।
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