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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 357
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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त्य꣡मु꣢ वो꣣ अ꣡प्र꣢हणं गृणी꣣षे꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡ति꣢म् । इ꣡न्द्रं꣢ विश्वा꣣सा꣢हं꣣ न꣢र꣣ꣳ श꣡चि꣢ष्ठं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् ॥३५७॥

स्वर सहित पद पाठ

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । अ꣡प्र꣢꣯हणम् । अ । प्र꣣हणम् । गृणीषे꣢ । श꣡व꣢꣯सः । प꣡ति꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । विश्वा꣣सा꣡ह꣢म् । वि꣣श्वा । सा꣡ह꣢꣯म् । न꣡र꣢꣯म् । श꣡चि꣢꣯ष्ठम् । वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् ॥३५७॥


स्वर रहित मन्त्र

त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम् । इन्द्रं विश्वासाहं नरꣳ शचिष्ठं विश्ववेदसम् ॥३५७॥


स्वर रहित पद पाठ

त्यम् । उ । वः । अप्रहणम् । अ । प्रहणम् । गृणीषे । शवसः । पतिम् । इन्द्रम् । विश्वासाहम् । विश्वा । साहम् । नरम् । शचिष्ठम् । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् ॥३५७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 357
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 2; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 1;
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पदार्थ -

प्रभु कहते हैं कि (वः) = तुममें से (त्यम् उ नरम्) उसी मनुष्य को (गृणीषे) = स्तुत करता हूँ, आदर देता हूँ अर्थात् वही मेरे प्रेम का पात्र होता है जो १. (शवस: पतिम्) = बल का पति है, परन्तु (अप्रहणम्) = हिंसा करनेवाला नहीं है। शक्ति होते हुए हिंसा न करना यह सयनता का महान् लक्षण है। निर्बल की विवशतावाली अहिंसा शोभा नहीं पाती । सबल होते हुए अहिंसक होना शक्ति को रक्षा के लिए विनियुक्त करना ही नर बनना है। २. (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यवाला है परन्तु उसे धन का मद नहीं। वह अभिमान में आकर छोटी-छोटी बातों पर तैश में नहीं आ जाता। (विश्वासाहम्) = सब बातों को सहनेवाला है। यह सदा विनीत बना रहता है, क्षमा की वृत्तिवाला होता है। 'अभ्युदये क्षमा' – यही तो महात्माओं का स्वभाव होता है कि सम्पन्नता में भी विनीत व क्षमाशील बने रहते हैं। ३. ये (विश्ववेदसम्) = सर्वज्ञ होते हैं - विश्व - त्र= सबकुछ जाननेवाले होते हैं, परन्तु सर्वज्ञकल्प होते हुए भी ये कर्म को हेय नहीं समझते। (शचिष्ठम्) = अधिक-से-अधिक क्रियाशील होते हैं। ये क्रिया को अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल नहीं समझते। यही वस्तुत: सच्चा ज्ञानी है 'बार्हस्पत्य' है। इसी का जीवन शान्ति से युक्त होता है अर्थात् यह अपने जीवन को शान्ति से युक्त करता है। इसीसे यह ‘शंयु' कहलाता है।

भावार्थ -

हम शक्तिशाली हों, परन्तु शक्ति का विनियोग रक्षा में करें, सम्पन्न होकर भी विनीत बने रहें तथा सर्वज्ञकल्प होकर भी सतत् क्रियाशील हों।
 

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