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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 457
ऋषिः - गृत्समदः शौनकः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अष्टिः
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
4
त्रि꣡क꣢द्रुकेषु महि꣣षो꣡ यवा꣢꣯शिरं तुविशु꣣ष्म꣢स्तृ꣣म्प꣡त्सोम꣢꣯मपिब꣣द्वि꣡ष्णु꣢ना सु꣣तं꣡ य꣢थाव꣣श꣢म् । स꣡ ईं꣢ ममाद꣣ म꣢हि꣣ क꣢र्म꣣ क꣡र्त्त꣢वे म꣣हा꣢मु꣣रु꣡ꣳ सैन꣢꣯ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥४५७॥
स्वर सहित पद पाठत्रि꣡क꣢꣯द्रुकेषु । त्रि । क꣣द्रुकेषु । महिषः꣢ । य꣡वा꣢꣯शिरम् । य꣡व꣢꣯ । आ꣣शिरम् । तुविशुष्मः꣢ । तु꣣वि । शुष्मः꣢ । तृ꣣म्प꣢त् । सो꣡म꣢꣯म् । अ꣣पिबत् । वि꣡ष्णु꣢꣯ना । सु꣣त꣢म् । य꣣थावश꣢म् । य꣣था । वश꣢म् । सः । ई꣣म् । ममाद । म꣡हि꣢꣯ । क꣡र्म꣢꣯ । क꣡र्त्त꣢꣯वे । म꣣हा꣢म् । उ꣣रु꣢म् । स । ए꣣नम् । सश्चत् । देवः꣢ । दे꣣व꣢म् । स꣣त्यः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । स꣣त्य꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् ॥४५७॥
स्वर रहित मन्त्र
त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृम्पत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशम् । स ईं ममाद महि कर्म कर्त्तवे महामुरुꣳ सैनꣳ सश्चद्देवो देवꣳ सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥४५७॥
स्वर रहित पद पाठ
त्रिकद्रुकेषु । त्रि । कद्रुकेषु । महिषः । यवाशिरम् । यव । आशिरम् । तुविशुष्मः । तुवि । शुष्मः । तृम्पत् । सोमम् । अपिबत् । विष्णुना । सुतम् । यथावशम् । यथा । वशम् । सः । ईम् । ममाद । महि । कर्म । कर्त्तवे । महाम् । उरुम् । स । एनम् । सश्चत् । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम् ॥४५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 457
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 12;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 12;
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विषय - महान् कर्म के लिए
पदार्थ -
(त्रिकद्गुकेशु?) = तीनों आह्वानों के समय पर [कदि= आह्वाने], अर्थात् प्रातः, मध्याह्ण और सायम् (महिष:) = उस प्रभु की पूजा करनेवाला [मह पूजायाम् ] और (अतएव तुविशुष्म:) = बहुत शक्तिवाला (यवाशिरम्) = सब कर्मेन्द्रियों को पवित्र करनेवाले (सोमम्) = सोम को (तृम्पत् अपिबत्) = तृप्त होता हुआ अर्थात् खूब पीता है। यव शब्द कर्मेन्द्रियों का वाचक है। यु मिश्रण और अमिश्रण-संयोग और विभाग; इसे करनेवाली ये कर्मेन्द्रियाँ ही हैं। इन कर्मेन्द्रियों के मल को [शृ हिंसायाम्] नष्ट करने से यह सोम ‘यवाशिर' कहलाता है। स्थानान्तर में इसका विशेषण ‘गवाशिर' भी है=ज्ञानेन्द्रियों के मलों को दूर करनेवाला; (दध्याशिरम्) = धारणशक्ति की कमी को दूर करनेवाला। यह सोम (विष्णुनासुतम्) = प्रभु से उत्पन्न किया गया है- प्रभु की वस्तुतः जीव को यह महान् भेंट है। इसका अपव्यय तो स्पष्ट प्रभु का निरादर है। इस सोम का पान (यथाशवम्) = उसी अनुपात में होता है जिस अनुपात में हम काम-क्रोधादि वासनाओं को वश में कर पाते हैं।
जो व्यक्ति इस सोम का पान करता है (सः) = वह (ईम्) निश्चय से १. (ममाद) = मदयुक्त प्रसन्न होता है। इसके जीवन में एक उल्लास होता है, २. यह व्यक्ति (महि कर्म) = महान् कर्म को (कर्तवे) = करने के लिए समर्थ होता है। इसका जीवन खाने-पीने व सोने में ही समाप्त नहीं हो जाता, ३. (सः) = वह (एनम्) = इस (महान्) = महान् (उरुम) = विशाल प्रभु को (सश्चद्) = प्राप्त होता है। महान् कर्म करनेवाला ही तो प्रभु को पाता है। खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ के सिद्धान्तवाला तो कभी भी उस प्रभु को पाने का अधिकारी नहीं होता। ४. (देव: देवम्) = यह सोमपान करनेवाला देव बनकर उस देव को पाता है। (सत्यः सत्यम्) = सत्य बनकर उस सत्यस्वरूप के समीप पहुँचता है। (इन्दुः इन्द्रम्) = शक्तिशाली बनकर उस शक्ति के देवता का उपासक होता है। 'इन्दु' शब्द शरीर की शक्ति का संकेत कर रहा है। 'सत्य' मन की पवित्रता का [मन: सत्येन शुध्यति] तथा 'देव' विद्वता का [विद्वांसो हि देवाः]।
यह व्यक्ति ‘महिष:' होने से 'गृत्स' है [गृणाति] प्रभु का उपासक है। [ममाद] उल्लासमय जीवनवाला होने से ‘मद' है [मद्यति] । क्रियाशील होने से शौनक है [शुन गतौ]=महि कर्म कर्तवे। एवं इस मन्त्र का ऋषि ‘गृत्समद शौनक' है।
भावार्थ -
हम भी ‘गृत्समद शौनक' बनने के लिए प्रयत्नशील हों।
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