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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 467
ऋषिः - अहमीयुराङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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उ꣣च्चा꣡ ते꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सो दि꣣वि꣡ सद्भूम्या द꣢꣯दे । उ꣣ग्र꣢꣫ शर्म꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥४६७॥
स्वर सहित पद पाठउ꣣च्चा꣢ । उ꣣त् । चा꣢ । ते꣣ । जात꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दि꣣वि꣢ । सत् । भू꣡मि꣢꣯ । आ । द꣣दे । उग्र꣢म् । श꣡र्म꣢ । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥४६७॥
स्वर रहित मन्त्र
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे । उग्र शर्म महि श्रवः ॥४६७॥
स्वर रहित पद पाठ
उच्चा । उत् । चा । ते । जातम् । अन्धसः । दिवि । सत् । भूमि । आ । ददे । उग्रम् । शर्म । महि । श्रवः ॥४६७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 467
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1;
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विषय - आकाश में होता हुआ भूमि पर
पदार्थ -
, प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘अहमीयुः' है–‘न महीं यौति युनक्ति वा ' = जो अपने साथ पृथिवी का सम्पर्क नहीं करता - भौतिक भोगों में नहीं फँसता, अतएव शक्तिशाली बना रहता है। इससे प्रभु कहते हैं कि (ते) = तेरा (अन्धसः) = इस आध्यायनीय सोम के द्वारा (उच्चा जातम्) = अत्यन्त उच्च विकास हुआ है। जो व्यक्ति सोम की रक्षा का ध्यान नहीं करता वह ‘निषाद' बनता है–‘निषीदति अस्मिन् पापमिति'=उसमें आसुरी वृत्तियाँ आश्रय करती हैं, परन्तु जब यह सोम रक्षा का निश्चय कर लेता है तो शु+उत् + र शक्ति की शीघ्र ऊर्ध्वगति करनेवाला यह 'शूद्र' हो जाता है। सोम के अङ्ग-प्रत्यङ्ग में प्रवेश करने पर [ विश् to enter] वैश्य-विश् होता है। उस - उस स्थान में क्षतों से त्राण करने के कारण ये 'क्षत्रिय' बनता है और ज्ञानशक्ति के दीप्त होने से ब्रह्म को जानने के कारण यह 'ब्राह्मण' बन जाता है। इस प्रकार सोम की महिमा से मनुष्य ऊँचा और ऊँचा उठता चलता है - इसका अत्यन्त उच्च विकास होता है, परन्तु सौन्दर्य की बात तो यह है कि (दिविसत्) = द्युलोक में होता हुआ यह (भूमि आददे) = भूमि का ग्रहण करता है। अधिक-से-अधिक ऊँचा होता हुआ यह अत्यन्त विनीत होता हैं दैवी सम्पत्ति का सर्वोच्च शिखर = बसपउंग 'नातिमानिता' ही तो है।
(उग्रं शर्म) = इसका आनन्द भी उदात्त होता है यह राजस व तामस सुखों में नहीं फँसतां इसका सात्त्विक सुख उत्तरोत्तर बढ़ता ही चलता है। उस ज्ञान के क्षेत्र में विचरता हुआ यह सांसारिक सुखों की तुच्छता को अनुभव करता है।
(महि श्रवः) = चारों ओर इसकी महनीय कीर्ति फैल जाती है। इसका जीवन इतना सुन्दर बन गया है कि उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलती है। लोग उसकी तेजस्विता, उसके ज्ञान व उसकी प्रशस्त मनोवृत्ति की गाथा गाते नहीं अघाते ।
भावार्थ -
सोम-रक्षा से मनुष्य उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। विनीत बना रहता है। सात्त्विक सुख में ही आनन्द लेता है और महनीय कीर्तिवाला होता है।
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