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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 475
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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प꣡रि꣢ स्वा꣣नो꣡ गि꣢रि꣣ष्ठाः꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ सो꣡मो꣢ अक्षरत् । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥४७५॥

स्वर सहित पद पाठ

प꣡रि꣢꣯ । स्वा꣣नः꣢ । गि꣣रिष्ठाः꣢ । गि꣣रि । स्थाः꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣣ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣क्षरत् । म꣡दे꣢꣯षु । स꣣र्वधाः꣢ । स꣣र्व । धाः꣢ । अ꣣सि ॥४७५॥


स्वर रहित मन्त्र

परि स्वानो गिरिष्ठाः पवित्रे सोमो अक्षरत् । मदेषु सर्वधा असि ॥४७५॥


स्वर रहित पद पाठ

परि । स्वानः । गिरिष्ठाः । गिरि । स्थाः । पवित्रे । सोमः । अक्षरत् । मदेषु । सर्वधाः । सर्व । धाः । असि ॥४७५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 475
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1;
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पदार्थ -

(सोमः) = सोम (परि-सु - आनः) = शरीर में सर्वत्र उत्तमता से प्राणशक्ति को बढ़ानेवाला है। ४९ प्रकार के वायु जो १० प्राणों के रूप से कहे जाते हैं - जिनमें 'प्राण- अपान-व्यानउदान-समान' ये पाँच विशेषरूप से प्रसिद्ध हैं और उनमें भी 'प्राण- अपान-व्यान' का 'भूर्भुवः स्वः' के रूप में उल्लेख किया जाता है - इन तीन का भी संक्षेप 'प्राणापान' में हो जाता है और एक शब्द में इन्हें प्राण के रूप में हम स्मरण करते हैं। यह प्राण इस सोम के रक्षण से पुष्ट होता है। यह हमें (गिरिष्ठाः) = उन्नति के शिखर पर पहुँचाता है - और (पवित्रे) = पवित्रता के निमित्त (अक्षरत्) = सब मलों को क्षरित करता है। 'मलों को दूर करके पवित्रता का उत्पादन' यह सोम का कार्य है। इसी से हमारे शरीर नीरोग रहते हैं, मन इर्ष्या-द्वेष से ऊपर उठे रहते हैं और मस्तिष्क उज्ज्वल बना रहता है। एवं यह सोम (मदेषु) = मद - उत्साहजनक वस्तुओं में (सर्वधा असि) = सर्वाधिक धारण करनेवाला है। यह हमें रोगादि के जाल से और इर्ष्या-द्वेषादि के बन्धनों से मुक्त करके ‘असित' बनाता है। हमारे ज्ञान को उज्ज्वल करके हमें ‘काश्यप’ बनाता है तथा हमारे अन्दर दिव्यता का संचार करता हुआ हमें 'देवल' बना देता है।
 

भावार्थ -

सोम की रक्षा से मैं जीवन में सोत्साह, पवित्र, व स्थिर बनूँ।

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