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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 491
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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प्र꣢꣫ यद्गावो꣣ न꣡ भूर्ण꣢꣯यस्त्वे꣣षा꣢ अ꣣या꣢सो꣣ अ꣡क्र꣢मुः । घ्न꣡न्तः꣢ कृ꣣ष्णा꣢꣫मप꣣ त्व꣡च꣢म् ॥४९१॥

स्वर सहित पद पाठ

प्र꣢ । यत् । गा꣡वः꣢꣯ । न । भू꣡र्ण꣢꣯यः । त्वे꣣षाः꣢ । अ꣣या꣡सः꣢ । अ꣡क्र꣢꣯मुः । घ्न꣡न्तः꣢꣯ । कृ꣣ष्ण꣢म् । अ꣡प꣢꣯ । त्व꣡च꣢꣯म् । ॥४९१॥


स्वर रहित मन्त्र

प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः । घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥४९१॥


स्वर रहित पद पाठ

प्र । यत् । गावः । न । भूर्णयः । त्वेषाः । अयासः । अक्रमुः । घ्नन्तः । कृष्णम् । अप । त्वचम् । ॥४९१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 491
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3;
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पदार्थ -

(यद्) = जब (गावो न) = गौवों के समान या वेदवाणियों के समान (भूर्णयः) = भरण करनेवाले ये सोम (प्र अक्रमुः) = गति करते हैं तो (कृष्णां त्वचम्) = काले आवरण- परदे को (अपघ्नन्तः) = नष्ट करते हुए गति करते हैं। सोम हमारे जीवन का भरण करनेवाले हैं, उसी प्रकार जैसे गौवों का दूध हमारे शरीर को नीरोग, मन को सात्त्विक तथा मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाता है। वेदवाणियाँ भी हमारे जीवन के पोषण में पर्याप्त स्थान रखती हैं। (त्वेषा:) = ये दीप्तिवाले हैं—इनके कारण हमारा जीवन - मार्ग प्रकाशमय बना रहता है। (अयासः) = ये निरन्तर गतिवाले हैं। शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर थकता नहीं है। अनथकरूप से निरन्तर आगे बढ़ता हुआ यह मार्ग में आनेवाली रुकावटों को दूर करता जाता है। ये रुकाबटें ही ज्ञान के आवरण हैं। काम, क्रोध, लोभादि आवरण काली त्वचा के रूप में हैं- सोम इनका नाश कर देता है। विघ्नों के दूर हो जाने पर, यात्रा को पूर्ण करके यह उस मेध्य पवित्र प्रभु का 'अतिथि' बनता है, अत: इसका नाम मेध्यातिथि हो जाता है। यह ऐसा एक-एक कदम चलते-चलते कण-कण करके बन पाया है, अतः इसका नाम 'काण्व' है। ,

भावार्थ -

हम सोम का धारण करें। ये हमारा धारण करेंगे। हमारे मार्ग को प्रकाशमय बनाएँगे। हम अनथकरूप से आगे बढ़ेंगे। सब विघ्न-बाधाओं को पार कर जाएँगे।

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